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Nanu Ki Jaanu Movie Review

Nanu Ki Jaanu Movie Review  रिव्यू-रायता बनाना सिखाती है ‘नानू की जानू’ -दीपक दुआ…  लड़की का पिता आलू के परांठे बना रहाथा। वह दही लेने घर से निकली। एक्सीडेंट हुआ। मर गई। जिस लड़के ने उसे अस्पताल पहुंचाया, उसी के घर भूतनी बन कर पहुंच गई। लड़का गुंडागर्दी करता था। अब वह बदलने लगा। धमकाने की बजाय मिमियाने लगा। लड़की को हिट करने वाले को तलाशने लगा। राज़ खुला कि लड़की की आत्मा क्यों भटक रही थी।अंत में उसे मुक्ति मिल गई। यह फिल्म देखने के बाद ख्याल आता है कि लड़की दही ले आती तो बाप-बेटी परांठे-दही खा लेते। न कोई बवाल मचता, न यह फिल्म बनती। मगर नहीं। लड़की दही लेकर नहीं लौटी और रायता बन गया-कहानी का भी और फिल्म का भी। कॉमेडी फिल्में लगभग हर किसी को पसंद आती हैं। हॉरर फिल्मों के दीवानों की गिनती भी बहुत है। लेकिन इन दोनों स्वादों को मिला कर हॉरर-कॉमेडी बनाना कोई हंसी-खेल नहीं।सतीश कौशिक जैसा निर्देशक ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ में मात खा चुका है। अनुष्का शर्मा वाली ‘फिल्लौरी’ भी हॉरर और कॉमेडी के घालमेल में कुछ ठोस नहीं कह पाई थी। यही दिक्कत इस फिल्म के साथ भी है। पहली प्रॉब्लम तो इसके नाम के साथ है। सुन कर लगता है कि किसी नाना और उसकी दोहती की कहानी कहती बच्चों की फिल्म होगी। वह भी होती तो सही था। यहां तो बचकानी फिल्म निकली। हीरो का नाम नानू है। तुक मिलाने के लिए साथ में जानू जोड़ दिया है जबकि लव-शव वाला कोई चक्कर न तो दिखता है, न समझ में आता है। वैसे यह एक तमिल फिल्म का रीमेक है। इसकी कहानी को उस फिल्म से अलग करने के लिए मनु ऋषि ने मेहनत भी की है लेकिन नतीजा औसत से ऊपर नहीं आ पाया है। स्क्रिप्ट में मुद्दे की बातें कम हैं, बिखरी हुई हैं और ज्यादा प्रभावी भी नहीं हैं। अब कहने को यह फिल्म बहुत कुछ कहती है। किसी का मकान किराए पर लेकर उसे कब्जाने और मकान-मालिक को धमका कर उसे बेचने पर मजबूर करने का ‘बिजनेस’ सिखाती है। ड्राइविंग के समय मोबाइल के इस्तेमाल न करने, स्कूटर चलाते समय हेलमेट पहनने, सड़क-हादसे में दूसरों की मदद करने, पड़ोस की बच्ची के लिए चॉकलेट लाने, घरेलू हिंसा को न सहने, सिगरेट-शराब न पीने, तंतर-मंतर करने वालों पर भरोसा न करने, माता के जागरण में ढोंग से बचने… जैसी चार सौ छप्पन बातें हैं इस फिल्म में। कहीं-कहीं हल्का-सा हॉरर और थोड़ी-बहुत कॉमेडी भी है। बस, नहीं है तो उम्दा मनोरंजन। नहीं है तो कोई ठोस बात। नहीं है तो वह पकड़ जो आपको बांधे रख सके। अब नहीं है, तो नहीं है।   अभय देओल उम्दा रहे हैं। नायिका पत्रलेखा ठंडी लगीं। भूतनी बनने के बाद …

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पुरुष भी टूट कर प्यार कर सकता है

पुरुष भी टूट कर प्यार कर सकता है -दीपक दुआ   दिल्ली में जन्मे मगर दुबई और न्यूजीलैंड में पले-बढ़े मोहित मदान को एक्टिंग का शौक मुंबई खींच लाया। बचपन से ही अपने भीतर हिन्दी फिल्मों का नशा महसूस कर चुके मोहित यहां काफी सारे विज्ञापनों के अलावा राज शैट्टी …

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अभिनय के लिए आॅब्जर्वेशन और रिसर्च वर्क जरूरी

अभिनय के लिए आॅब्जर्वेशन और रिसर्च वर्क जरूरी –गोविंद नामदेव मध्यप्रदेश के सागर में जन्मे और दिल्ली के नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा में एक लंबा समय बिताने के बाद मुंबई की रंग-बिरंगी दुनिया में नाम कमाने वाले अभिनेता गोविंद नामदेव का ध्यान अब फिल्मों में अभिनय करने से ज्यादा अभिनय सिखाने पर …

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Baaghi 2 Movie Review

Baaghi 2 Movie Review    रिव्यू-‘बागी 2’ अझेल भेल रेलमपेल -दीपक दुआ…  ‘बागी 2’ का शो शुरू होने से पहले ही मैं थिएटर की कैंटीन से भेलपूरी की प्लेट ले आया था। बड़ी वाली। बंदे ने बड़े ही उत्साह से एक भगौने में कई तरह की नमकीन, सेव,मुरमुरे, चिप्स, नमक, 2-3 किस्म के मसाले,3-4 किस्म …

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Hichki Movie Review

Hichki Movie Review  रिव्यू-च्च…च्च…‘हिचकी’, वाह…वाह…‘हिचकी’ -दीपक दुआ…  एक नामी स्कूल। होशियार बच्चे। काबिल टीचर। कुछ बच्चे नालायक। न वे पढ़ना चाहते हैं न उन्हें कोई पढ़ाना चाहता है। एक नया टीचर आता है। बाकियों से अलग।पढ़ाने का ढंग भी जुदा।नालायक बच्चे उसे भगाने की साज़िशें करते हैं। लेकिन वह डटा रहता है, टिक जाता है और उन्हीं नालायक बच्चों को होशियार बना देता है। इस कहानी में नया क्या है? कुछ भी नहीं। ‘जागृति’ और ‘परिचय’ से लेकर ‘तारे जमीन पर’ तक में कमोबेश ऐसी कहानियां हम देखते आए हैं। मगर इस फिल्म में नया यह है कि यहां स्कूल में आई नई टीचर खुद एक अजीब-सी बीमारी या आदत से ग्रस्त है जिसे ‘टूरैट सिंड्रोम’कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अपने शरीर की कुछ आवाज़ों और हलचलों पर नियंत्रण नहीं रहता।जैसे नैना के मुंह से अक्सर ‘च्च… च्च… वा… वा…’ की आवाज़ें निकलती रहती हैं। बचपन से लेकर उसने अब तक इसकी वजह से बहुत कुछ झेला है और अब इन नालायक बच्चों को पढ़ाने की चुनौती स्वीकार करने के बाद उसे उनसे ही नहीं, अपनी इन आवाज़ों से भी जूझना है। शुरूआत में लगता है कि यह फिल्म नैना के टूरैट सिंड्रोम से भिड़ने और जीतने की कहानी दिखाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। यह फिल्म वही पुरानी कहानी दिखाती है जिसमें किताबी तरीकों से बच्चों को पढ़ा रहे किसी अनुभवी टीचर के मुकाबले अनूठे ढंग से पढ़ाने वाले एक नए टीचर की जीत दिखा दी जाती है। जिसमें नालायक समझे जाने वाले बच्चे उस टीचर का साथ पाकर जिम्मेदारी महसूस करने लगते हैं। यह फिल्म एक साथ कई बातें सिखाती है। किसी शारीरिक या मानसिक समस्या से ग्रस्त बच्चे के साथ उसके परिवार वालों और समाज को कैसे पेश आना चाहिए से लेकर नालायक समझे जाने वाले बच्चों के साथ उनके टीचर्स को कैसा बर्ताव करना चाहिए तक की सीखें यह देती है। लेकिन दिक्कत यही है कि इन सारी बातों में नयापन नहीं दिखता। फिर जिस तरहसे हालात तेजी से बदलते हैं उससे सब कुछ ‘फिल्मी-सा’ भी लगने लगता है। हमें पहले ही यह आभास हो जाता है कि जो पहले नालायक हैं, बाद में वही होशियार निकलेंगे। कहानी का बेहद बारीक धागे पर टिके होना फिल्म को हल्का बनाता है। घटनाओं और चैंकाने वाले पलों का लेप लगा कर इसे और वजनी बनाया जाना चाहिए था। ‘वी आर फैमिली’ दे चुके निर्देशक सिद्धार्थपी. मल्होत्रा के डायरेक्शन में काफी परिपक्वता आई है। लेकिन कमाल तोकिया है इस फिल्म के तमाम कला का रोंने। रानी मुखर्जी अद्भुत काम कर गई हैं।नीरज कबी बेहद प्रभावी रहे। सचिन औरउनकी पत्नी सुप्रिया पिलगांवकर, आसिफबसरा, शिव सुब्रह्मण्यम, कुणाल शिंदे, स्पर्श खनचंदानी, रिया शुक्ला और तमाम बच्चे उम्दा रहे। ‘आई एम कलाम’ में आचुके और इस फिल्म में आतिश बने हर्ष मयार में एक ज़बर्दस्त आग है। आने वाले वक्त में यह लड़का कमाल करेगा। गीत-संगीत फिल्म के मिजाज के मुताबिक है। यह फिल्म टूरैट सिंड्रोम से ज्यादा शिक्षा व्यवस्था के बारे में बात करती है। बुरे, अच्छे,समझदार और परफैक्ट टीचर के बीच का फर्क बताती है। हां, आंखें भी नम करती है और समझाती-सिखाती भी है। पहले हिस्से में ठंडी-सूखी रह कर दूसरे हाफ में उड़ान भी भरती है।बस, चौंकाती नहीं है, कुछ नया देते-देते थम जाती है और इसी वजह से मास्टरपीस नहीं बन पाती।       …

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रवीना टंडन और फाजिलपुरिया ने लांच किया नया वुडको पेंट

रवीना टंडन और फाजिलपुरिया ने लांच किया नया वुडको पेंट अभिनेत्री रवीना टंडन के साथ गायक फाजिलपुरिया हाल ही में वुडको द्वारा नए पर्यावरण अनुकूल पेंट्स की लॉन्चिंग के मौके पर दिल्ली में मौजूद थे। वुडको के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन जिंदल ने बताया कि वुडको के ये पेंट्स पर्यावरण के …

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Raid Movie Review

Raid Movie Review  रिव्यू-ऐसी ‘रेड’ ज़रूर पड़े, बार-बार पड़े -दीपक दुआ… फिल्म वाले अक्सर स्यापा करते हैं कि उनके पास नई और अच्छी कहानियां नहीं हैं। कैसे नहीं हैं? पुराणों-पोथियों को बांचिए, अपने आसपास की दुनिया को देखिए, बीते दिनों के अखबारी पन्नों को पलटिए तो जितनी कहानियां इस मुल्क में मिलेंगी उतनी तो कहीं मिल ही नहीं सकतीं।आखिर (‘एयरलिफ्ट’, ‘पिंक’ समेत कई फिल्में लिख चुके)रितेश शाह भी तो इन्हीं पन्नों से यह कहानी निकाल कर लाए ही हैं न। 80 के दशक के शुरू में उत्तर प्रदेश के कई शहरों में इन्कम टैक्स अफसरों ने कई चर्चित रेड डाली थीं। उन्हीं को आधार बना कर बुनी गई इस कहानी की पहली और सबसे बड़ी खासियत यही है कि पहले ही सीन से यह आपको अपने आगोश में ले लेती है और हल्की-फुल्की डगमगाहट के बावजूद आपका साथ नहीं छोड़ती। एक बाहुबली सांसद के यहां पड़े इन्कम टैक्स के छापे की इस कहानी में जो तनाव जरूरी होना चाहिए, वह पहले ही सीन से महसूस होने लगता है और लगातार आप उसे अपने भीतर पाते हैं कि अब आगे क्या होगा, कैसे होगा। कहीं-कहीं सिनेमाई छूट ली गई है लेकिन यह फिल्म ज्यादा फिल्मी हुए बिना आपको बांधे रखती है। अपनी ईमानदारी के चलते बार-बार ट्रांस्फर होने वाले सरकारी कर्मचारी की कहानियां हमलोग ‘सत्यकाम’ के जमाने से देखते आए हैं। खुद अजय देवगन हमें इस फिल्म से अपनी ही ‘गंगाजल’, ‘आक्रोश’ और ‘सिंघम’ की याद दिलाते हैं। लेकिन इन तीनों फिल्मों में वह पुलिस की वर्दी में थे जबकि ‘रेड’ समर्पित ही उन ईमानदार और साहसी अफसरों को की गई है जो बिना वर्दी के इस देश के विभिन्न महकमों में अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं। इस फिल्म के नायक का साहस अगर हमारी हिम्मत बढ़ाता है तो वहीं सांसद के घर से निकला करोड़ों का काला धन हमें संतुष्टि देता है। वही संतुष्टि जो हमें पर्दे पर हीरो के हाथों पिटते विलेन को देखकर मिलती है। ‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी अच्छी फिल्मों के बाद ‘घनचक्कर’ जैसी एक बेहद खराब फिल्म देने के पौने पांच साल बाद निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने इस फिल्म से जो सधी हुई वापसी की है, उससे वह उम्मीदें जगाते हैं। फिल्म के संवादों के लिए रितेश शाह तारीफ के हकदार हैं। ‘इंडिया के ऑफिसर्स का नहीं, उनकी बीवियों का बहादुर होना जरूरी है’जैसा संवाद और मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ का जिक्र बताता है कि उनकी कलम में अभी काफी स्याही बची है। फिल्म के किरदारों के अनुरूप कलाकारों के चयन के लिए अभिषेक बैनर्जी और अनमोल आहूजा की भी तारीफ जरूरी है। अजय देवगन एक बार फिर से फुल फॉर्म में हैं। संवादों, आंखों और चेहरे के हाव भाव से वह मारक अभिनय करते हैं।सांसद बने सौरभ शुक्ला लाउड होने की तमाम संभावनाओं के …

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Pari Movie Review

Pari: Not a Fairytale Movie Review  |3/5|   रिव्यू-‘परी’-कथा नहीं व्यथा है -दीपक दुआ…  किसी हाॅरर फिल्म से आखिर हमें क्या उम्मीद होती है? यही न कि उसमें कोई बुरी आत्मा होगी जो किसी के शरीर में घुस जाएगी। फिर वो उसे और उसके आस पास वालों को चैन से जीने नहीं देगी।कोई तांत्रिक, ओझा, पंडित, पादरी टाइप का बंदा आएगा। तंतर-मंतर होंगे, खून-खराबा होगा, फिर सब सही हो जाएगा।चलते-चलते एक सीन ऐसा भी आएगा कि फिल्म का सीक्वेल बन सके। पहले राम से भाइयों और इधर विक्रम भट्ट ने हमें हाॅरर फिल्मों के नाम पर जो अफीम चटाई है उसके नशे में हम किसी हाॅरर फिल्म से इससे कुछ हट कर दिखाने की उम्मीद भी नहीं करते हैं। यही कारण है कि अपने यहां हाॅरर के नाम पर सुपर नेचुरल चीजें ही ज्यादा आती हैं,साइक्लाॅजिकल नहीं। कोई रामगोपाल वर्मा इस रास्ते पर चलना भी चाहता है तो किनारे कर दिया जाता है। खैर, अनुष्का शर्मा की यह फिल्म ‘परी’ हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है जिसमें सुपर नेचुरल बातें होने के बावजूद इंसानी पहलुओं को नजर अंदाज नहीं किया गया है। बतौर निर्माता अनुष्का शर्मा अभी तक की अपनी तीनों फिल्मों-‘एन.एच.10’, ‘फिल्लौरी’ और अब ‘परी’ से अपनी एक अलहदा जमीन तलाश रही हैं। स्वाभाविक है कि इस तलाश में उन्हें ठोकरें भी मिलेंगी लेकिन उनकी इस हिम्मत की तारीफ बनती है कि मसाला सिनेमा के पाले से आने के बावजूद वह एक अनदेखे, अनजाने मैदान में पांव टिकाने की कोशिशें कर रही हैं। प्रोसित राॅय के निर्देशन में संभावनाएं दिखती हैं। अनुष्का शर्मा अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं तो प्रमब्रत चटर्जी अंडरप्ले करते हुए असर छोड़ते हैं। रजत कपूर, ऋताभरी चक्रवर्ती, दिब्येंदु भट्टाचार्य व तमाम दूसरे कलाकार उम्दा काम करते दिखे हैं। कैमरे के दृष्टि और बैकग्राउंड म्यूजिक से अपेक्षित असर सामने आ पाया है। कोलकाता शहर की बारिश भी इसमें एक किरदार के तौर पर दिखती है और जेहन में बाकी रह जाती है। इस फिल्म की कहानी आम दर्शकों के लिए थोड़ी क्न्फ्यूजन भरी हो सकती है। डराने वाले दृश्यों से ज्यादा दहलाने वाले दृश्यों का होना भी हाॅरर पसंद करने वालों को अखर सकता है।कहानी का ट्रीटमैंट लीक से हट कर है और मुमकिन है नींबू-मिर्ची की आदत लगा बैठे दर्शकों को यह न पसंद आए। लेकिन अगर सचमुच हाॅरर के दायरे में कुछ हट कर देखने का मन हो,कुछ मैच्योर किस्म का समझ में आता हो तो यह फिल्म आपको पसंद आएगी और याद भी …

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Sonu Ke Titu Ki Sweety Movie Review { 3.5/5 }

Sonu Ke Titu Ki Sweety Movie Review { 3.5/5 }  रिव्यू-‘चुटीले’ सोनू के ‘प्यारे’ टीटू की ‘करारी’ स्वीटी -दीपक दुआ… बचपन के दो दोस्त सोनू और टीटू। पक्के याड़ी। टीटू रोए तो सोनू चुप कराए। टीटू को लड़की गलत मिली तो सोनू ने ब्रेकअप करवा दिया। जब टीटू की शादी …

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Kuch Bheege Alfaaz Movie Review

 Kuch Bheege Alfaaz  Movie Review (3/5)   रिव्यू-मन को नम करते ‘कुछ भीगे अल्फाज़’ -दीपक दुआ… कभी ऐसा भी होता है न कि रेडियो सुनते-सुनते किसी आर.जे. के साथ इश्क हो जाए? इश्क न सही, उस आर.जे. के साथ, उसके अल्फाज़ों के साथ, एक राब्ता-सा तो जुड़ने ही लगता है।निर्देशक …

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