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Tumbbad Movie Review

Tumbbad Movie Review रिव्यू-सिनेमाई खज़ाने की चाबी है ‘तुम्बाड’ -दीपक दुआ… ‘दुनिया में हर एक की ज़रूरत पूरी करने का सामान है, लेकिन किसी का लालच पूरा करने का नहीं।’महात्मा गांधी के इस कथन से शुरू होने वाली यह फिल्म अपने पहले ही सीन से आपको एक ऐसी अनोखी दुनिया में ले चलती है जो इससे पहले किसी हिन्दी फिल्म में तो क्या, शायद किसी भारतीय फिल्म में भी कभी नहीं दिखी होगी। महाराष्ट्र का एक वीरान गांव-तुम्बाड, जहां हर वक्त बारिश होती रहती है क्यों कि देवता क्रोधित हैं। इस लिए कि पूरी धरती को अपनी कोख से जन्म देने वाली देवी ने अपनी सबसे पहली संतान हस्तर को उनके हाथों मरने से बचा लिया था। वही लालची हस्तर, जो देवी के एक हाथ से बरसते सोने को तो ले गया लेकिन देवताओं ने उसे दूसरे हाथ से बरसते अनाज को नहीं ले जाने दिया। उसी हस्तर के मंदिर के पुजारियों के परिवार में भी दो तरह की संतानें हुईं-लालची और संतुष्ट। 1913 के साल में ये लोग यहां से चले तो गए लेकिन लालची विनायक लौटता रहा और हस्तर के खज़ाने से अपनी जेबें भर-भर ले जाता रहा। उसने अपने बेटे को भी सिखाया कि यह खज़ाना कैसे हाथ लगता है। लेकिन विनायक अपनी दादी की कही यह बात भूल गयाकि-‘विरासत में मिली हुई हर चीज़ पर दावा नहीं करना चाहिए।’ अपने ट्रेलर से एक हॉरर-फिल्म होने का आभास कराती यह फिल्म कई मायने में अनोखी है। यह कोई हॉरर फिल्म नहीं है। यह डर,रहस्य और परालौकिकता के आवरण में लिपटी एक कहानी कहती है जो इंसानी मन की उलझनों और महत्वाकांक्षाओं की बात करती है। हमारे यहां अव्वल तो इस फ्लेवर की फिल्में होती ही नहीं हैं, होती भी हैं तो उनमें तंतर-मंतर, नींबू-मिरची हावी रहता है। कह सकते हैं कि जैसे हॉलीवुड से ‘द ममी’ सीरिज़ वाली फिल्में आई हैं जिनमें खज़ाना खोजने वाली एक कहानी के चारों तरफ डर, रहस्य, परालौकिकता, हास्य, प्यार, एक्शन आदि का आवरण होता है, जिनमें पूरी तार्किकता के साथ उन कहानियों में मिस्र के पिरामिडों से जुड़ी हमुनात्रा जैसी एक ऐसी काल्पनिक दुनिया खड़ी की जाती है जिस के न होने का यकीन होते हुए भी वह आपको सच्ची लगती है। ठीक उसी तरह से महाराष्ट्र के रत्ना गिरी जिले के एक गांव तुम्बाड की कहानी दिखाती यह फिल्म आपको अपनी बातों से विश्वसनीय लगने लगती है कि ज़रूर देवी ने यहीं दुनिया को अपने गर्भ में रखा होगा, ज़रूर यहीं पर हस्तर का मंदिर होगा …

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Page3 Awards with Lara Dutta & Sasmira Team

Team Sasmira with Lara Dutta at the PAGE3 Awards – 2018   लारा दत्ता ने बांटे फैशन अवार्ड अदाकारा लारा दत्ता ने हाल ही में मुंबई में सस्मीरा एन्चांटे के सहयोग से आयोजित पेज 3 फैशन अवार्ड बांटे। फैशन, ज्वैलरी, लाइफस्टाइल, एसेसरी डिजाइनिंग आदि के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को …

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Online Gaming Tournament

Online Gaming Tournament  ऑनलाइन गेमिंग टूर्नामेंट टीईजीसी की शानदार वापसी ऑनलाइन गेमिंग के दीवानों के लिए ताईवान एक्सिलेंस गेमिंग कप (टीईजीसी) सुनहरा मौका लेकर आया है। गेमिंग का यह महा-मुकाबला प्रो-गेमिंग के सबसे बड़े पुरस्कार के साथ आ पहुंचा है। बीते चार साल में टीईजीसी ने गेमिंग के दीवानों के …

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Pakhi Movie Review

Pakhi Movie Review    रिव्यू-रूखी-सूखी ‘पाखी’ -दीपक दुआ… एक कोठा। उसका एक खूंखार मालिक। कुछ लड़कियां। कोई हंस कर तो कोई रो कर अपने ‘काम’ को करती लड़कियां। वहां लड़कियां बेच कर जाते हैं लोग। कोई अपनी प्रेमिका, कोई भतीजी तो किसी और को बेच जाता है वहां। लेकिन जब …

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Paltan Movie Review

Paltan Movie Review   रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’ -दीपक दुआ…  कुछ सैनिक।उनके परिवारों की कहानियां। सरहदपर एक सच्चीलड़ाई। जोश,जज़्बा, देशप्रेम…बन गई ‘बॉर्डर’।एक उम्दा,क्लासिक वाॅर-फिल्म। फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एकसच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात… बन गई ‘एल.ओ.सी. कारगिल’। क्लासिकन सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म। एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां।एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव… बन गई ‘पलटन’। लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न। एक ही फ़ॉर्मूले पर और एक ही शैलीमें कई सारी फिल्में बनाना कोई गलत नहीं।लगभग हर फिल्मकार ने ऐसाकिया है, करता है। लेकिन अगर आपके फ़ॉर्मूले का गाढ़ापन कम और आपकी शैली की धारभोथरी होती चली जाए तो फिर ऐसी ही फिल्में बनेंगी, जो ज़रूरी होते हुए भीकमज़ोर होंगी, नाकाबिल-ए-तारीफ होंगी। अपने यहां की युद्ध आधारित फिल्मों में हमारा दुश्मन आमतौर पर पाकिस्ता नही रहा है जबकि सच यह भी है भारत-चीन के संबंध भी कभी बहुत मीठे नहीं रहे, आज भी नहीं है। चेतन आनंद की ‘हकीकत’ ज़रूर 1962 के भारत-चीन युद्ध की बात करती है लेकिन उस लड़ाई में चीन के हाथों बुरी तरह से हारने के पांचसाल बाद नाथू ला और चो ला की लड़ाई की कहानी तो शायद इतिहास के छात्रों को भी न याद हो। जे.पी. दत्ता की यह फिल्म उसी नाथू ला की लड़ाई के बारे मेंहै जिसमें अगर भारतीय सेना न जीती होती तो मुमकिन है कि आज सिक्किमका नाम चीनी नक्शे में होता। लेकिन वह लड़ाई आमलड़ाइयों जैसी नहीं थी। एक-दूसरे से चंद मीटर की दूरी पर बैठे हिन्दुस्तानी और चीनी सिपाही वहां गोलियों से नहीं बल्कि गालियों, धक्कों,पत्थरों से लड़ रहे थे। कहसकते हैं कि वह लड़ाई शारीरिक से ज़्यादा मानसिक तौर पर लड़ी जा रही थी। दत्ता ने उसे पूरी ईमानदारी से दिखाया भी है। लेकिन इस किस्म की फिल्म में जो नाटकीयता, जो आक्रामकता, जो व्यापकता और जो विशालता होनी चाहिए (जिसकी लत भी हमें दत्ता ने ही लगाई), उसकी कमीइस फिल्म को सर्वदा शक्तिशाली होने से रोक देती है। सैनिकों की बैक-स्टोरी काउसी पुराने घिसे-पिटे स्टाइल में होना, दमदार संवादों की कमी और सबसे बढ़कर दमदार अभिनेताओं की कमी भी इस फिल्म को सिर्फ एक औसत फिल्म ही बना पाती है। क्लाइमैक्स में शहीद सैनिकों के अस्थि-कलशों का घर आनाआंखें नम करता है। हालांकि सभीकलाकारों की मेहनत दिखती है लेकिन ऊपर वालेने उन बेचारों की रेंज ही सीमित बनाई हैतो वो भी क्या करते। फिल्म में कई जगह चीनी संवादों के नीचे अंग्रेज़ी में सब-टाइटल हैं। क्यों जी, हिन्दी कीचंद लाइनें भी तो हो सकती थीं। या फिर चीनी ही रहने देते। आखिर ‘इन्दी-चीनी बाई-बाई’ ही तो हैं। गीत-संगीत अच्छा होते हुए भी दिल में नहीं उतरपाता। दिल में तो खैर, यह पूरी फिल्म ही नहीं उतर पाती। पर हां, इस तरह की कहानियां कही जानी चाहिएं। वरना वक्त की धूल हमारे इतिहास को धुंधला करती जाएगी और पता भी नहीं चलेगा।     अपनी रेटिंग–दो स्टार     …

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Laila Majnu Movie Review

Laila Majnu Movie Review रिव्यू-कचरा लव-स्टोरी है ‘लैला मजनू’ -दीपक दुआ… दो परिवार। दोनों में अदावत। दोनों के बच्चे आपस में प्यार कर बैठे। घरवालों ने उन्हें जुदा कर दिया तो दोनों ने एक-दूसरे के लिए तड़पते हुए जान दे दी। यही तो कहानी थी ‘लैला मजनू’ की। इसी कहानी पर बरसों से …

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HALKAA Movie Review

HALKAA Movie Review     रिव्यू-‘हल्का’-एक हल्की टॉयलेट कथा -दीपक दुआ…  दिल्ली की एक झोंपड़पट्टी।गरीबी, अशिक्षा,गंदगी, कीचड़। कोई टॉयलेट नहीं। नज़दीक की रेलवे लाइन पर ‘हल्के’ होते सब लोग। टॉयलेट के लिए मिलने वाले सरकारी पैसे से ऐश करते लोग। उस पैसे को देने की एवज में रिश्वत मांगते सरकारी अफसर। स्कूल जाने की बजाय कचरा बीनते बच्चे।इन्हीं बच्चों में से एक पिचकू। सबके सामने ‘हल्का’ होने में उसे शर्म आती है।पिता टॉयलेट बनवाने को तैयार नहीं। बच्चा खुद ही यह बीड़ा उठाता है। कहने को स्वच्छ भारत और शौचालय की ज़रूरत की बात करती है यह फिल्म।लेकिन इस बात को कहने के लिए जिस किस्म की कहानी ली गई है, वह सिरेसे पैदल है और उस पर जो स्क्रिप्ट तैयार की गई है, वो निहायत ही बचकानी है। ‘हल्के’ होते समय किसी इंसान की निजता और गरिमा को बनाए रखने कीज़रूरत की बात इसमें सिर्फ नज़र आती है, महसूस नहीं होती। पूरी बस्ती के लोग, मर्द, औरतें, बच्चे रेल की पटरी पर ‘हल्के’ होते हैं लेकिन किसी को अपनी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं। और वह बच्चा भी कोई अलख नहीं जगा रहा है,बस, पैसे जोड़-जोड़ कर एक टॉयलेट बनाने की जुगत में है। एक महंगे स्कूल मेंपढ़ने वाले अमीर बच्चे उसकी जिस तरह से मदद करते हैं, वो मदद कम और भीख ज़्यादा लगती है। इसी महंगे स्कूल के पैसे से बनी फिल्म से और भला उम्मीद हो भी क्या सकती थी? ज़मीन से जुड़ी इस कहानी का प्रवाह बहुत ही बनावटी है और यही कारण है कि इसे देखते हुए आप इससे जुड़ नहीं पाते। फिर ‘हल्के’ होने के सीन इसमें इस कदर विस्तार से हैं कि इसे देखते समय कोफ्त होने लगती है। दिल्ली पर ढेरों फिल्में आई हैं। लेकिन दिल्ली की इतनी खराब तस्वीर शायद ही किसी फिल्म में आई हो। और हां, इसे देखने के दौरान कुछ खाने-पीने की तो आप सोच भी नहीं सकते। क्यों कि, सोच के आगे… शौच है। हैरानी और अफसोस इस बात का भी है कि यह फिल्म उन नीला माधव पांडाकी है जो ‘आई एम कलाम’, ‘जलपरी’ और ‘कड़वी हवा’ जैसी असरदार फिल्म बना चुके हैं। असर तो उन्होंने इसमें भी भरपूर डालने की कोशिश की लेकिन अपनी हल्की कहानी, हल्के सैट अप और उतने ही हल्के डायरेक्शन के चलते यह एक बहुत ही हल्की फिल्म बन कर रह गई। इस पर तो 20-30 मिनट कीशॉर्ट-फिल्म बनाई जानी चाहिए थी, बस। रणवीर शौरी, पाओली दाम, कुमुद मिश्रा, किसी की भी एक्टिंग दिल को नहीं छू पाती क्यों कि उनके किरदारों में हीदम नहीं है। पिचकू बने तथास्तु का काम साधारण है। म्यूज़िक, कैमरा भी सबहल्का रहा। सिर्फ अपने विषय के चलते यह फिल्म कहीं पुरस्कार भले बटोर लेलेकिन असल में यह फिल्म एक दुरुपयोग है-पैसों का, संसाधनों का, वक्त का,एक अच्छे फिल्मकार की उर्जा का और सबसे बढ़ कर सिनेमा का।     …

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Gold Movie Review 2018

Gold Movie Review   रिव्यू-फीकी चमक वाला ‘गोल्ड’  -दीपक दुआ…  1936 के बर्लिन ओलंपिक में गुलाम भारत यानी ब्रिटिश इंडिया की हॉकी टीम ने गोल्ड मैडल तो जीता लेकिन स्टेडियम में ब्रिटेन का राष्ट्र गान बज रहा था। देश आज़ाद हुआ तो उसी टीम के जूनियर मैनेजर ने सपना देखा कि 1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम ‘दो सौ साल की गुलामी’ के बाद जीते और अपने ‘जन गण मन…’की धुन पर गोल्ड लेकर आए। और बस, वो जुट गया तमाम बाधाओं के बीच एक जानदार टीम तैयार करने में जो एक शानदार जीत हासिल कर सके। यह सही है कि 1948 में भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ब्रिटेन को उसी के घर में 4-0 से हरा कर गोल्ड जीता था। लेकिन इतिहास यह नहीं बताता कि वो सपना किसी टीम-मैनेजर का था। लेकिन यह फिल्म है जनाब, जो इतिहास के कुछ सच्चे किस्सों में ढेर सारी कल्पनाएं मिला कर आपको देश प्रेम की ऐसी चाशनी चटाती है कि आप बिना कुछ आगा-पीछा सोचे बस, उसे चाटते चले जाते हैं। फिल्म अपने कलेवर से ‘चक दे इंडिया’ और ‘लगान’ सरीखी लगती है। लेकिन अपने तेवर से यह उनके पांव की धूल भी साबित नहीं हो पाती। ‘चक दे इंडिया’ का कोच कबीर खानखुद पर लगे दाग को साफ करने के लिए लौटा है। ‘लगान’के खिलाड़ी अपनी दासता के दर्द पर जीत का मरहम लगाना चाहते हैं। लेकिन यहां टीम-मैनेजर तपन दास क्यों बावलों की तरह खुद को, अपने पैसों को,अपनी पारिवारिक ज़िंदगी को हॉकी की टीम खड़ा करने में डुबो रहा है, फिल्म यह बताना ज़रूरी नहीं समझती। एक तरफ उसके किरदार को पियक्कड़, धोखेबाज़,खिलंदड़ दिखाया जाना और दूसरी तरफ देश के प्रति अचानक से जगने वाला समर्पण अजीब-सा लगता है। बेहतर होता कि तपन की किसी बैक-स्टोरी से कोई पुख्ता आधार बनाया जाता और उस पर कहानी की इमारत खड़ी होती। फिल्म की स्क्रिप्ट भी कई गैर ज़रूरी और लंबे दृश्यों के कारण बार-बार हिचकोले खाती है। कुछ एक मिनट की कटाई-छंटाई इसे और बेहतर बना सकती थी। हालांकि कहानी लगातार आगे की तरफ चल रही है, तपन के टीम को बनाने की मेहनत,आज़ादी और मुल्क के बंटवारे के बाद टीम के कई सदस्यों का हिन्दुस्तान से चले जाना, तपन का एक नई टीम बनाना, लंदन में पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी खिलाड़ियों का एक-दूजे को सपोर्ट करना जैसे सीक्वेंस लुभाते तो हैं लेकिन ज़्यादा मजबूती से बांध नहीं पाते। क्लाइमैक्स में होने वाले मैच में भारत के जीतने और उधर स्टेडियम व इधर थिएटर में लोगों के खड़े होने ने रोमांचित करना ही था, सो किया।   यह फिल्म इतना तो बताती ही …

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