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Movie Review

Mukkabaaz Movie Review {3/5 }

Mukkabaaz Movie Review Mukkabaaz  is a 2017 Indian sports drama film co-written, co-produced and directed by Anurag Kashyap. It was screened in the Special Presentations section at the 2017 Toronto International Film Festival and the 2017 Mumbai Film Festival. Produced jointly by Anand L. Rai and Phantom Films, the film stars Vineet Kumar Singh, Zoya Hussain, Ravi Kishan and Jimmy Shergill. Mukkabaaz was released theatrically on …

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दंगल की समीक्षा अब स्कूली किताब में

‘दंगल’ की समीक्षा अब स्कूली किताब में आमिर खान वाली फिल्म ‘दंगल’ के बारे में देश भर में समीक्षकों-आलोचकों ने अलग-अलग तरह से लिखा। लेकिन इन्हीं में से एक समीक्षा ऐसी भी निकली जो अब स्कूली किताबों में एक पाठ की तरह पढ़ाई जा रही है। दिल्ली स्थित फिल्म समीक्षक …

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Kadvi Hawa (Dark Wind) Movie Review

Kadvi Hawa (Dark Wind) Movie Review   रिव्यू-कड़वी है मगर जरूरी है -दीपक दुआ…  ‘कड़वी हवा’ का एक सीन देखिए। क्लास के सब बच्चे एक लड़के की शिकायत करते हुए कहते हैं कि मास्टर जी, यह कह रहा है कि साल में सिर्फ दो ही मौसम होते हैं-गर्मी और सर्दी। मास्टर जी पूछते हैं-बरसात का मौसम कहां गया? जवाब मिलता है- ‘मास्साब, बरसात तो साल में बस दो-चार दिन ही पड़त…!’ यह सुन कर सब बच्चे हंस पड़ते हैं। इधर थिएटर में भी हल्की-सी हंसी की आवाजें फैलती हैं। लेकिन इस हल्के-फुल्के सीन में कितना बड़ा और कड़वा सच छुपा है उसे आप और हम मानते भले नहों, अच्छे से जानते जरूर हैं। बचपन में स्वेटर पहन कर रामलीला देखने वाली हमारी पीढ़ी आज दीवाली के दिन कोल्ड-ड्रिंक  पीते हुए जब कहती है कि अब पहले जैसा मौसम नहीं रहा, तो यह उस सच्चाई का ही बखान होता है जिसे जानते तो हम सब हैं, लेकिन उसके असर को मानने को राजी नहीं होते। नीला माधव पांडा की यह फिल्म हमें उसी सच से रूबरू करवाती है-कुछ कड़वाहट के साथ। कहानी बीहड़ के एक ऐसे अंदरूनी गांव की है जहां मौसम की मार के चलते हर किसान पर कर्ज है जिसे वापस करने की कोई सूरत न देख किसान एक-एक कर खुदकुशी कर रहे हैं।बैंक के कर्ज की वसूली करने वाले गुनु बाबू को लोग यमदूत कहते हैं क्योंकि वह जिस गांव में जाता है वहां दो-चार लोग तो मौत को गले लगा ही लेते हैं। गुनु बाबू के लिए उसके ‘क्लाइंट’ चूहे हैं। ऐसे में एक अंधा बूढ़ा अपने बेटे के लिए गुनु बाबू से एक अनोखा सौदा कर लेता है। पर क्या कड़वी हवा किसी को यूं ही छोड़ देती है? इस किस्म की फिल्मों के साथ अक्सर यह दिक्कत आती है कि ये या तो अति नाटकीय हो जाती हैं या फिर उपदेश पिलाने लगती हैं। और कुछ नहीं तो हार्ड-हिटिंग बनाने के चक्कर में इनमें दिल दहलाने वाली घटनाएं डालना तो आम बात है। लेकिन इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। सौ मिनट की होने के बावजूद यह मंथर गति से चलती है, मानो इसे अपनी …

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Review of this week’s film ‘Tumhari Sulu’ by Deepak Dua

Review of this week’s film ‘Tumhari Sulu’ by Deepak Dua रिव्यू-दिल जीतती ‘तुम्हारी सुलु’ –दीपक दुआ…  सुलोचना बारहवीं फेल है। बैंक में काम करने वाली ‘कामयाब’ बहनों की इस छोटी बहन के पति की सीमित आमदनी है।लेकिन वह अपने घर-परिवार में खा-पीकर मस्त रहती है। साथ वाले फ्लैट में रहती एयर होस्टेस लड़कियों को देख कर उसकी आंखों में भी चमकीले सपने तैरते हैं। उसे जीतना आता है। ‘मैं कर सकती है’ और ‘मुझे हर काम में मजा आता है’ जैसा उसका एटिट्यूड उसे चैन से नहीं बैठने देता। इसलिए कभी वह कॉलोनी की गायन-प्रतियोगिता में तो कभी नींबू-चम्मच रेस में तो कभी रेडियो पर पूछे जाने वाले सवाल का जवाब दे कर इनाम और इज्जत हासिल करती रहती है। ऐसे में सुलोचना को मिल जाता है रेडियो पर एक लेट-नाइट शो में काम करने का ऑफर, और वह बन जाती है लोगों की रातों को जगाने, उनके सपनों को सजाने वाली आर.जे. सुलु। पर क्या उसका परिवार उसके इस रूप को स्वीकार कर पाता है? इस कहानी में कुछ भी फिल्मी-सा नहीं है।सुलोचना जैसी औरतें हमारे घर-परिवार-पड़ोस में अक्सर दिख जाती हैं जो जिंदगी में करना तो बहुत कुछ चाहती हैं लेकिन हालात उन्हें चूल्हे-चौके तक सीमित करके रख देते हैं। पर कभी मौका मिले तो ये औरतें कुछ न कुछ हटके वाला काम कर ही जाती हैं। पड़ोस के किसी घर की-सीलगती इस कहानी में सब कुछ सामान्य है। अभावों में हंस-खेल कर जीता परिवार, घर, परिवार, नौकरी, बच्चे की पढ़ाई की चिकचिक, बाहर वालों से मिलती तारीफों के बीच अपनों के तानें… ऐसी स्क्रिप्ट लिखने के लिए लेखक को अपने लेखक वाले खोल से बाहर निकल कर आम इंसान होना होता है और सुरेश त्रिवेणी व विजय मौर्य ने यह बखूबी कर दिखाया है। फिर इस फिल्म में बोली गई जुबान चौंकाती है। मुंबइया परिवारों में लोग किस तरह से बात करते हैं, उसे करीब से परख कर इसमें परोसा गया है। लेकिन फिल्म कमियों से भी परे नहीं है। शुरूआत में उठान भरती कहानी बाद के पलों में दोहराव और बिखराव का शिकार होने लगती है। कुछ चीजें अखरने लगती हैं और कहानी के बहाव में आ रही दिक्कत भी साफ महसूस होती है। दो घंटे बीस मिनट की इसकी लंबाई अच्छा-खासा एडिट मांगती है।    सुरेश त्रिवेणी बतौर निर्देशक अपनी इस पहली फिल्म से असर छोड़ते हैं। गीत-संगीत फिल्म के माहौल में फिट है। एक्टिंग के मामले में जहां विद्या बालन हर बार की तरह प्रभावित …

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Shaadi Mein Zarur Aana movie review

रिव्यू-यह शादी कुछ मीठी-तीखी-फीकी   -दीपक दुआ… शादी वाली फिल्मों की लाइन लग चुकी है। फ़िल्म वालों की यह भेड़-चाल कुछ अच्छी तो कई खराब फिल्में लेकर आने वाली है। लेकिन हर फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ नहीं हो सकती, यह तय है। आप को कम मिठास वाली ‘बरेली की बर्फी’ …

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Qarib Qarib Singlle Movie Review

रिव्यू-करीब करीब बेहतरीन   -दीपक दुआ… अधेड़ उम्र को छू रहे नायक-नायिका अब तक सिंगल हैं। एक डेटिंग साइट की मदद से ये मिलते हैं और मिलते-मिलाते ये एक लंबे सफर पर निकल पड़ते हैं। इस दौरान एक-दूसरे को समझते-समझाते ये खुद को और जिंदगी को करीब से जान पाते …

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ITTEFAQ REVIEW BY FILM CRITIC DEEPAK DUA

ITTEFAQ REVIEW -Sidharth Malhotra, Sonakshi Sinha, Akshaye Khanna   रिव्यू-क्लासिक फिल्में ‘इत्तेफाक’ नहीं होतीं -दीपक दुआ…  दो कत्ल, दो कहानियां,लेकिन सच सिर्फ एक। या फिर वह भी नहीं। मर्डर मिस्ट्री फिल्मों का बरसों पुराना फ़ॉर्मूला। फिर यह फिल्म तो बी.आर. चोपड़ा के बैनर से 1969 में आई राजेश खन्ना-नंदा वाली इसी नाम …

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रिव्यू-‘गोलमाल’ है भई सब झोलझाल है…

रिव्यू-‘गोलमाल’ है भई सब झोलझाल है… -दीपक दुआ…  सबसे पहले कहानी की बात। हंसिए मत, ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में भी कहानी होती है। भले ही वह कितनी ही महीन, बारीक, पतली,हल्की, कमजोर, बेकार या ऊल-जलूल क्यों न हो। तो, इस कहानी में ‘गोलमाल’ वाले सारे कैरेक्टर ऊटी के एक अनाथाश्रम में पले-बढ़े हैं। उस अनाथाश्रम के सेठ जी …

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