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Laila Majnu Movie Review

Some love stories never die because some lovers never give up on their love! Imtiaz Ali and Ekta Kapoor's Laila Majnu is one such eternal love story. Set in Kashmir, the story revolves around Kais (Avinash Tiwary) and Laila (Tripti Dimri) whose journey of love is filled with insurmountable obstacles. Based on the classic story of Laila Majnu, this contemporary take on the tale has been penned by Imtiaz Ali.

Laila Majnu Movie Review

रिव्यू-कचरा लव-स्टोरी है ‘लैला मजनू’

-दीपक दुआ…

दो परिवार। दोनों में अदावत। दोनों के बच्चे आपस में प्यार कर बैठे। घरवालों ने उन्हें जुदा कर दिया तो दोनों ने एक-दूसरे के लिए तड़पते हुए जान दे दी। यही तो कहानी थी ‘लैला मजनू’ की। इसी कहानी पर बरसों से फिल्में बनती रहीं। कामयाब भी होती रहीं। क्यों…? क्यों कि उनमें मोहब्बत की वो तासीर थी कि दिल सायं-सायं करता था। भावनाओं के वो दरिया थे जो हमारी आंखों से बहते थे। इश्क का वो रूहानी अहसास था जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं। लेकिन अफसोस, इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो आपको छू तक सके।

कश्मीर में रहती लैला को अपने पीछे सारे शहर के लड़के टहलाना अच्छा लगता है। कैस रईस बाप का बिगड़ैल लड़का है। लेकिन लैला से मिलता है तो बदलनेलगता है। लैला के पिता उसकी कहीं और शादी कर देते हैं तो कैस चार साल के लिए लंदन चला जाता है। चार लंबे साल… और इन प्रेमियों के मन में कोई टीस नहीं उठती। यह बात ही हजम करने लायक नहीं है। चार साल बाद दोनों मिलतेहैं तो फिर से दीवानगी जाग उठती है। इस बार इन्हें सिर्फ चार महीने एक-दूसरे से दूर रहना है जिसके बाद इनकी शादी हो सकती है। लेकिन इनसे चार महीने भी नहीं कटते। यार, हद है राइटर साहब, फिल्म की टिकट के साथ हाजमे की गोली भी दे दो। हमें रोमांटिक फिल्में पसंद हैं तो आप कैसा भी कचरापरोसोगे…?

इस किस्म की कहानियों में इश्ककी जो ज़रूरी गर्माहट होनी चाहिए, वह इस फिल्म में सिरे सेगायब है। कहीं परभी, ज़रा-सा भीतो नहीं छू पातीयह फिल्म। पर्देपर इज़हार-ए-मोहब्बत हो रहा है और आप लकड़ी बने बैठे हों तो गलती आप की नहीं, लेखक और निर्देशक की है। पर्दे पर लैला का जनाज़ा उठे और आप शुक्रमनाते हुए कहें कि मजनू भी मरे तो फिल्म खत्म हो, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप के भीतर मोहब्बत की कुलबुलाहट नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह है कि फिल्म बनाने वाले उस कुलबुलाहट को छू ही नहीं पाए।

रूमानी फिल्मेंलिखने मेंमहारथी रहेइम्तियाज़ अलीसे इस कदर पैदलस्क्रिप्ट की उम्मीद नहीं थी।उनके भाई साजिद अली की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है और जिस तरह की हल्के सैटअप में इसे तैयार किया गया है, उससे शक होता है कि इम्तियाज ने कहीं उनसे बचपन में छीने गए किसी खिलौने या लॉलीपॉप की खुंदक तो नहीं निकाली। वरना इम्तियाज़ के नाम पर कायदे के कलाकार तो फिल्म में आ ही सकते थे। नए कलाकार भी लिए तो ऐसे जिनसे पूरी फिल्म तक नहीं संभलसकी। लैला बनीं तृप्ति डिमरी खूबसूरत तो लगीं लेकिन प्रभावी नहीं। अविनाशतिवारी शुरू में अच्छे लगते-लगते अंत तक आते-आते प्रभावहीन हो गए।कश्मीर की कहानी और एक-दो को छोड़ कर किसी भी कलाकार के संवादों में कश्मीरी लहज़ा न हो तो लगता है कि मेहनत करने से बचा गया है। और हां,आज के दौर की इस कहानी में कश्मीर के मौजूदा हालात का अगर ज़िक्र तक नहो, तो आप उस फिल्मकार को क्या कहेंगे? क्या वह देश-समाज से इतना कटाहुआ है? म्यूज़िक दो-एक जगह ही असर छोड़ पाया है।

सच तो यह है कि जब सब कुछ बेहद कमज़ोर, हल्का, रसहीन, स्वादहीन,गंधहीन हो तो उस कचरे में मौजूद इक्का-दुक्का अच्छी चीज़ें भी असर छोड़ने की बजाय चुभने-सी लगती है। और इसी लिए यह फिल्म न सिर्फ सिनेमा के,बल्कि रूमानी कहानियों तक के माथे पर लगा एक दाग है।

 

अपनी रेटिंगडेढ़ स्टार

 

 

 

 

 

 

 

 

दीपक दुआ- फिल्म समीक्षक

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

यह आलेख सब से पहले www.cineyatra.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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