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December, 2018

  • 21 December

    4th Khajuraho International Film Festival – 2018

    4th Khajuraho International Film Festival – 2018   जन-जन से जुड़ता अनोखा फिल्मोत्सव -दीपक दुआ   देश भर में होने वाले किस्म-किस्म के फिल्म समारोहों से परे ‘खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’ इस मायने में खास है कि यह यह खजुराहो जैसी उस जगह पर होता है जहां कोई थिएटर, कोई …

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November, 2018

  • 8 November

    Thugs of Hindostan Movie Review | रिव्यू-ठग्स ऑफ बॉलीवुड है यह – by Deepak Dua

    Thugs of Hindostan Movie Review by Deepak Dua रिव्यू-ठग्स ऑफ बॉलीवुड है यह -दीपक दुआ… आखिर एक लंबे इंतज़ार और काफी सारे शोर-शराबे के बाद ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान’ की बंद मुट्ठी खुल ही गई। और अब आप यह जानना चाहेंगे कि यह फिल्म कैसी है? क्या इस फिल्म पर अपनी मेहनत और ईमानदारी (या बेईमानी) से कमाए गए पैसे खर्च किए जाएं या फिर इसे छोड़ दिया जाए? चलिए, शुरू करते हैं।   साल 1795 के हिन्दोस्तान की रौनक पुर (चंपक, नंदन,पराग की कहानियों से निकले) नाम वाली कोई रियासत। ऊंचा, भव्य किला जो किसी पहाड़ी पर है लेकिन समुंदर के ठीक सामने। (अब भले ही अपने देश में ऐसी कोई जगह न हो।) लेकिन वहां कोई भी ऐसा पेड़ नहीं दिखता जो अक्सर समुंदरी किनारों पर पाए जाते हैं।अरे भई, काल्पनिक इलाका है, आप तो मीन-मेख निकालने बैठ गए। खैर,अंग्रेज़ी अफसर क्लाइव ने यहां के राजा को मार दिया लेकिन राजा का वफादार खुदा बख्श (अमिताभ बच्चन) राज कुमारी ज़फीरा (फातिमा सना शेख) को लेकर निकल भागा।  11 बरस में इन्होंने ‘आज़ाद’ नाम से बागियों की एक फौज बनाली जो अंग्रेज़ों की नाक में दम किए हुए है। उधर अवध का रहने वाला फिरंगी मल्लाह (आमिर खान) अंग्रेज़ों के लिए काम करता है और उन ठगों को पकड़वाता है जो लोगों को लूटते हैं। (अवध का आदमी समुद्री इलाके में…? आपन सवाल बहुते पूछते हो गुरु)। क्लाइव साहब खुदा बख्श यानी आज़ाद को पकड़ने का जिम्मा फिरंगी को सौंपते हैं। लेकिन फिरंगी की तो फितरत ही है धोखा देना। वह कभी इस को, कभी उस को तो कभी सब को धोखा देता हुआ इस कहानी को अंजाम तक पहुंचाता है। कहा जा रहा था कि यह फिल्म ‘कन्फेशन्स आॅफ ए ठग’ नाम के एक उपन्यास …

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October, 2018

  • 15 October

    Tumbbad Movie Review

    Tumbbad Movie Review रिव्यू-सिनेमाई खज़ाने की चाबी है ‘तुम्बाड’ -दीपक दुआ… ‘दुनिया में हर एक की ज़रूरत पूरी करने का सामान है, लेकिन किसी का लालच पूरा करने का नहीं।’महात्मा गांधी के इस कथन से शुरू होने वाली यह फिल्म अपने पहले ही सीन से आपको एक ऐसी अनोखी दुनिया में ले चलती है जो इससे पहले किसी हिन्दी फिल्म में तो क्या, शायद किसी भारतीय फिल्म में भी कभी नहीं दिखी होगी। महाराष्ट्र का एक वीरान गांव-तुम्बाड, जहां हर वक्त बारिश होती रहती है क्यों कि देवता क्रोधित हैं। इस लिए कि पूरी धरती को अपनी कोख से जन्म देने वाली देवी ने अपनी सबसे पहली संतान हस्तर को उनके हाथों मरने से बचा लिया था। वही लालची हस्तर, जो देवी के एक हाथ से बरसते सोने को तो ले गया लेकिन देवताओं ने उसे दूसरे हाथ से बरसते अनाज को नहीं ले जाने दिया। उसी हस्तर के मंदिर के पुजारियों के परिवार में भी दो तरह की संतानें हुईं-लालची और संतुष्ट। 1913 के साल में ये लोग यहां से चले तो गए लेकिन लालची विनायक लौटता रहा और हस्तर के खज़ाने से अपनी जेबें भर-भर ले जाता रहा। उसने अपने बेटे को भी सिखाया कि यह खज़ाना कैसे हाथ लगता है। लेकिन विनायक अपनी दादी की कही यह बात भूल गयाकि-‘विरासत में मिली हुई हर चीज़ पर दावा नहीं करना चाहिए।’ अपने ट्रेलर से एक हॉरर-फिल्म होने का आभास कराती यह फिल्म कई मायने में अनोखी है। यह कोई हॉरर फिल्म नहीं है। यह डर,रहस्य और परालौकिकता के आवरण में लिपटी एक कहानी कहती है जो इंसानी मन की उलझनों और महत्वाकांक्षाओं की बात करती है। हमारे यहां अव्वल तो इस फ्लेवर की फिल्में होती ही नहीं हैं, होती भी हैं तो उनमें तंतर-मंतर, नींबू-मिरची हावी रहता है। कह सकते हैं कि जैसे हॉलीवुड से ‘द ममी’ सीरिज़ वाली फिल्में आई हैं जिनमें खज़ाना खोजने वाली एक कहानी के चारों तरफ डर, रहस्य, परालौकिकता, हास्य, प्यार, एक्शन आदि का आवरण होता है, जिनमें पूरी तार्किकता के साथ उन कहानियों में मिस्र के पिरामिडों से जुड़ी हमुनात्रा जैसी एक ऐसी काल्पनिक दुनिया खड़ी की जाती है जिस के न होने का यकीन होते हुए भी वह आपको सच्ची लगती है। ठीक उसी तरह से महाराष्ट्र के रत्ना गिरी जिले के एक गांव तुम्बाड की कहानी दिखाती यह फिल्म आपको अपनी बातों से विश्वसनीय लगने लगती है कि ज़रूर देवी ने यहीं दुनिया को अपने गर्भ में रखा होगा, ज़रूर यहीं पर हस्तर का मंदिर होगा …

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  • 15 October

    गुजरात में मची नवरात्रि की धूम

    गुजरात में मची नवरात्रि की धूम नवरात्रि के दिन हों तो याद आता है गरबा-रास। और गरबा देखने व करने के लिए गुजरात से बेहतर कोई जगह नहीं। यही इच्छा हमें खींच ले गई अहमदाबाद जहां के विशाल जी.एम.डी.सी. ग्राउंड में एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैले पंडाल में …

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  • 5 October

    Ranveer Singh & Deepika PADUKONE Met Kamal Haasan

    Ranveer Singh & Deepika Padukone Met Mr Kamal Haasan at the Hindustan Times Leadership Summit 2018. Ranveer couldn’t stop gushing about Mr Haasan mush and showed his. They spoke about each other’s session.                           Ranveer Singh & Deepika …

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  • 4 October

    Page3 Awards with Lara Dutta & Sasmira Team

    Team Sasmira with Lara Dutta at the PAGE3 Awards – 2018   लारा दत्ता ने बांटे फैशन अवार्ड अदाकारा लारा दत्ता ने हाल ही में मुंबई में सस्मीरा एन्चांटे के सहयोग से आयोजित पेज 3 फैशन अवार्ड बांटे। फैशन, ज्वैलरी, लाइफस्टाइल, एसेसरी डिजाइनिंग आदि के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को …

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  • 1 October

    Online Gaming Tournament

    Online Gaming Tournament  ऑनलाइन गेमिंग टूर्नामेंट टीईजीसी की शानदार वापसी ऑनलाइन गेमिंग के दीवानों के लिए ताईवान एक्सिलेंस गेमिंग कप (टीईजीसी) सुनहरा मौका लेकर आया है। गेमिंग का यह महा-मुकाबला प्रो-गेमिंग के सबसे बड़े पुरस्कार के साथ आ पहुंचा है। बीते चार साल में टीईजीसी ने गेमिंग के दीवानों के …

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  • 1 October

    Poster Launch Chal Jaa Bapu

    First Look of Chal Jaa Bapu   #PosterLaunch 🔥   Film – “Chal Jaa Bapu”   Trailer launch of movie “Chal Jaa Bapu” on 2nd October 2018     Staring- Ashutosh Kaushik ( Winner of Big Boss ), Hrishita Bhatt & Zakir Husain Directed by Dedipya Joshii Produced by Varun Gaur …

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September, 2018

  • 20 September

    Pakhi Movie Review

    Pakhi Movie Review    रिव्यू-रूखी-सूखी ‘पाखी’ -दीपक दुआ… एक कोठा। उसका एक खूंखार मालिक। कुछ लड़कियां। कोई हंस कर तो कोई रो कर अपने ‘काम’ को करती लड़कियां। वहां लड़कियां बेच कर जाते हैं लोग। कोई अपनी प्रेमिका, कोई भतीजी तो किसी और को बेच जाता है वहां। लेकिन जब …

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  • 10 September

    Paltan Movie Review

    Paltan Movie Review   रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’ -दीपक दुआ…  कुछ सैनिक।उनके परिवारों की कहानियां। सरहदपर एक सच्चीलड़ाई। जोश,जज़्बा, देशप्रेम…बन गई ‘बॉर्डर’।एक उम्दा,क्लासिक वाॅर-फिल्म। फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एकसच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात… बन गई ‘एल.ओ.सी. कारगिल’। क्लासिकन सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म। एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां।एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव… बन गई ‘पलटन’। लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न। एक ही फ़ॉर्मूले पर और एक ही शैलीमें कई सारी फिल्में बनाना कोई गलत नहीं।लगभग हर फिल्मकार ने ऐसाकिया है, करता है। लेकिन अगर आपके फ़ॉर्मूले का गाढ़ापन कम और आपकी शैली की धारभोथरी होती चली जाए तो फिर ऐसी ही फिल्में बनेंगी, जो ज़रूरी होते हुए भीकमज़ोर होंगी, नाकाबिल-ए-तारीफ होंगी। अपने यहां की युद्ध आधारित फिल्मों में हमारा दुश्मन आमतौर पर पाकिस्ता नही रहा है जबकि सच यह भी है भारत-चीन के संबंध भी कभी बहुत मीठे नहीं रहे, आज भी नहीं है। चेतन आनंद की ‘हकीकत’ ज़रूर 1962 के भारत-चीन युद्ध की बात करती है लेकिन उस लड़ाई में चीन के हाथों बुरी तरह से हारने के पांचसाल बाद नाथू ला और चो ला की लड़ाई की कहानी तो शायद इतिहास के छात्रों को भी न याद हो। जे.पी. दत्ता की यह फिल्म उसी नाथू ला की लड़ाई के बारे मेंहै जिसमें अगर भारतीय सेना न जीती होती तो मुमकिन है कि आज सिक्किमका नाम चीनी नक्शे में होता। लेकिन वह लड़ाई आमलड़ाइयों जैसी नहीं थी। एक-दूसरे से चंद मीटर की दूरी पर बैठे हिन्दुस्तानी और चीनी सिपाही वहां गोलियों से नहीं बल्कि गालियों, धक्कों,पत्थरों से लड़ रहे थे। कहसकते हैं कि वह लड़ाई शारीरिक से ज़्यादा मानसिक तौर पर लड़ी जा रही थी। दत्ता ने उसे पूरी ईमानदारी से दिखाया भी है। लेकिन इस किस्म की फिल्म में जो नाटकीयता, जो आक्रामकता, जो व्यापकता और जो विशालता होनी चाहिए (जिसकी लत भी हमें दत्ता ने ही लगाई), उसकी कमीइस फिल्म को सर्वदा शक्तिशाली होने से रोक देती है। सैनिकों की बैक-स्टोरी काउसी पुराने घिसे-पिटे स्टाइल में होना, दमदार संवादों की कमी और सबसे बढ़कर दमदार अभिनेताओं की कमी भी इस फिल्म को सिर्फ एक औसत फिल्म ही बना पाती है। क्लाइमैक्स में शहीद सैनिकों के अस्थि-कलशों का घर आनाआंखें नम करता है। हालांकि सभीकलाकारों की मेहनत दिखती है लेकिन ऊपर वालेने उन बेचारों की रेंज ही सीमित बनाई हैतो वो भी क्या करते। फिल्म में कई जगह चीनी संवादों के नीचे अंग्रेज़ी में सब-टाइटल हैं। क्यों जी, हिन्दी कीचंद लाइनें भी तो हो सकती थीं। या फिर चीनी ही रहने देते। आखिर ‘इन्दी-चीनी बाई-बाई’ ही तो हैं। गीत-संगीत अच्छा होते हुए भी दिल में नहीं उतरपाता। दिल में तो खैर, यह पूरी फिल्म ही नहीं उतर पाती। पर हां, इस तरह की कहानियां कही जानी चाहिएं। वरना वक्त की धूल हमारे इतिहास को धुंधला करती जाएगी और पता भी नहीं चलेगा।     अपनी रेटिंग–दो स्टार     …

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