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    Gold Movie Review   रिव्यू-फीकी चमक वाला ‘गोल्ड’  -दीपक दुआ…  1936 के बर्लिन ओलंपिक में गुलाम भारत यानी ब्रिटिश इंडिया की हॉकी टीम ने गोल्ड मैडल तो जीता लेकिन स्टेडियम में ब्रिटेन का राष्ट्र गान …

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रिव्यू-काश यह ‘भूमि’ ज़मीन से जुड़ी होती

रिव्यू-काश यह ‘भूमि’ ज़मीन से जुड़ी होती –दीपक दुआ…                  डियर ओमंग कुमार जी, आपने ‘मैरी कॉम’ जैसी बढ़िया बायोपिक बनाई तो कुछ-कुछ फिल्मी होने के बावजूद हमने उसकी तारीफ की कि उम्दा कंटैंट है और फिल्म बहुत कुछ कहती है। फिल्म को कामयाबी मिली और तारीफों के साथ पुरस्कार भी। फिर आपने ‘सरबजीत’ बनाई तो थोड़े ज्यादा फिल्मी हो गए और फिल्म को सरबजीत की बजाय उसकी बहन की कहानी बना कर रख दिया। फिर भी भावनाओं के ज्वार में हमने उसकी तारीफ कर डाली। हालांकि इस बार न फिल्म को वैसी कामयाबी मिली और न ही तारीफें।इन दो बायोपिक के बाद जब आपने ‘भूमि’ बनानी शुरू की तो याद है हम लोगों ने कितने सवाल किए थे? और आगरा में तो मैंने आपसे यह भी पूछा था कि आपकी फिल्म के स्क्रिप्टराईटर ने अब तक सिर्फ कॉमेडी शोज़ लिखे हैं, उनसे ऐसे संजीदा विषय पर फिल्म क्यों लिखवा रहे हैं? लीजिए, आशंका सच निकली न!  न राज शांडिल्य कायदे की पटकथा लिखपाए और न ही आप सलीके का निर्देशन दे पाए। अरे हुजूर, अब इस तरह की और इस तरह से फिल्में नहीं बना करती हैं। लड़की के साथ रेप हुआ और वह आकर बाथरूम में सिर पर पानी डाले जा रही है, यह सीन बरसों पहले अपना महत्व और उष्मा खो चुका है। कानून कुछ नहीं कर सका तो बाप चल पड़ा बलात्कारियों से बदला लेने वाला टॉपिक भी अब इस कदर घिस चुका है कि अब इसे देख कर न तो हमारी भावनाएं जोर मारती हैं और न ही हमें उससे हमदर्दी होती है। रेप जैसा संजीदा विषय पकड़ने के बाद आप फिल्मी लोग इस कदर फैल कर फिल्मी-विल्मी हो जाते हो कि खुद आपके लिए उसे समेटना भारी पड़ जाता है। और आप तो निकल लेते हो फिल्म बना कर, झेलना हमें पड़ जाता है।     इस फिल्म के निर्माता संदीप सिंह की ही लिखी इस कहानी को सुन कर संजय दत्त को अगर यह लगा हो कि यह फिल्म उनकी वापसी के लिए उपयुक्त रहेगी, तो इसमें उनका …

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रिव्यू-हसीना पारकर-आपा, स्यापा, क्यूटियापा…

रिव्यू-हसीना पारकर-आपा, स्यापा, क्यूटियापा… -दीपक दुआ…  वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई। एक समय की बात है। ‘बॉम्बे’ पुलिस के एक बेहद ‘ईमानदार’ पुलिस हवलदार का बेटा गरीबी और शोषण का शिकार होकर गलत रास्ते पर चल निकला। पुलिस ने उसे अपने मतलब के लिए शह दी और देखते ही देखते वह इस शहर का शहंशाह बन बैठा। लेकिन जब उस मजलूम पर जुल्म हुए तो वह बेचारा अपनी पहली मोहब्बत ‘बंबई’ को बिलखता छोड़ कर दुबई चला गया। साथ ही चले गए उसके सारे रिश्तेदार क्योंकि उन पर भी भारी अत्याचार हो रहे थे। बस, पीछे रह गई तो उसकी गरीब, मासूम बहन जिस पर शहर की पुलिस उंगलियां उठाती रही क्योंकि वह एक ‘देशद्रोही’ की बहन थी। ऐसा मोस्टवांटेड, जिसने इस शहर की बहनों की भेजी एक चिट्ठी को दिल पर लेकर शहर में कुछ एक जगह बम फोड़ कर उनकी रक्षा की थी। लोगों के बर्ताव से तंग आकर इस अबला बहन ने भी ताकत बटोरनी शुरू की। लोगों ने उसे इज्जत बख्शी, उसने कबूल की और वह बन बैठी इस शहर की ‘आपा’। उसी महान वीरांगना की ही दर्द भरी दास्तान है इस फिल्म में। सो, मिस्टर अपूर्व लखिया, चार घटिया और एक औसत गैंग्स्टर फिल्म ‘शूटआउटएट लोखंडवाला’ बनाने के बाद, माना कि आप इस फिल्म में दाउद इब्राहीम को सिस्टम का सताया हुआ और हसीना आपाको बेचारी मजबूर औरत के तौर पर दर्शाना चाहते हैं। जरूर दर्शाइए। किसी लेखक या फिल्मकार की सोच की आलोचना नहीं की जा सकती। लेकिन जो आप कहना, दिखाना चाहते थे उसके लिए कायदे की स्क्रिप्ट तो गढ़ लेते। मतलब,आप इस कदर पैदल, सड़क छाप पटकथा लेंगे और उसे इस घटिया, कल्पना विहीन तरीके से फिल्माएंगे…? यार, अपना नहीं तो कम से कम उस बंदे के स्टेटस का ख्याल तो रख लेते जिस पर फिल्म बना रहे थे। दाउद दुबई में ब्लैक एंड व्हाइट टी.वी. देखता है, जज हसीना से बात करते हुए बेवजह मुस्कुराता है, मतलब कुछ भी…!     चलो, वह न सही, कुछ कायदे के एक्टर ही ले लेते। श्रद्धा कपूर इस रोल में कहां से फिट लगीं आपको। हालांकि बंदी ने मेहनत खूब की। और श्रद्धा के भाई सिद्धांत कपूर को पर्दे पर आया अब तक का सबसे घटिया दाउद कह सकते हैं। फिल्म में अंडरवल्र्ड से जुड़े ज्यादातर नाम नहीं बदले गए यानी जाहिर है कि कहीं न कहीं उन लोगों की सहमति थी इस फिल्म के साथ। हां, हसीना के खिलाफ एफ.आई.आर. करने वाले विनाद अवलानी को फिल्म अदवानी कर देती है। (यह अदवानी क्या होता है? अब भारत में अडवाणी या आडवाणी सरनेम भी अनोखा है क्या?)     इस फिल्म में कुछ नहीं है। कुछ भी नहीं। कहानी, पटकथा, निर्देशन, एक्शन, म्यूजिक,हास्य, भावनाएं, मैसेज, मनोरंजन…! सच तो यह है कि यह फिल्म आपा के नाम पर स्यापा करती नजर आती है जिसे एक शब्द में ‘क्यूटियापा’ (समझ तो गए होंगे) ही कहें तो बेहतर होगा।           …

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रिव्यू-न्यूटन-‘न्यू’ है और ‘टनाटन’ भी…

रिव्यू-न्यूटन-‘न्यू’ है और ‘टनाटन’ भी… –दीपक दुआ…   मां-बाप ने नाम रखा था नूतनकुमार। लोग सुन कर हंसते थे तो उसने दसवीं के फॉर्म में ‘नू’का ‘न्यू’ कर दिया और ‘तन’ का ‘टन’। अब न्यूटन कुमार(राजकुमार राव) सरकारी नौकर हैं और नियम-कायदे के पक्के। लोकसभा चुनाव में बंदे की ड्यूटी लगती है छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाके के एक छोटे-से गांव में जहां सिर्फ 76 वोटर हैं। वहां मौजूद सुरक्षा बल की टुकड़ी का मुखिया आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) चाहता है कि बस, किसी तरह से वोट डल जाएं और आज का यह दिनबीते। लेकिन न्यूटन बाबू हर काम पूरे नियम और कायदे से करेंगे, चाहे खुद की जान पर हीक्यों न बन आए।   दुनिया का सबसे लोकतंत्र भारत और उस लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव आम चुनाव।गौर करें तो इन चुनावों के मायने नेताओं के लिए, चुनाव करवाने वाले कर्मचारियों के लिए, सुरक्षा बलों के लिए और जनता के लिए अलग-अलग होते हैं। 76 वोटर वाले इस गांव की किसी नेता को फिक्र नहीं है। लेकिन न्यूटन ट्रेनिंग में मिली सीख-स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने पर तुला है। न्यूटन की यह जिद उसकी टीम के लोकनाथ बाबू (रघुवीर यादव) की सोच और आत्मा सिंह के रवैये पर भारी पड़ती है।बूथ लेवल अधिकारी के तौर पर इस टीम से जुड़ी स्थानीय टीचर मल को नेताम (अंजलि पाटिल) की टिप्पणियां चुभते हुए अलग ही सवाल पूछती हैं। असल में वह मल को ही है जो इन शहरी बाबुओं को बताती है कि यहां के आदिवासियों के लिए चुनाव कितने गैर जरूरी हैं।वोट दें तो नक्सली मारेंगे और न दें तो पुलिस। हमें क्या चाहिए, यह कोई नहीं पूछता, जैसे छोटे मगर चुभते संवाद फिल्म को गहराई देते हैं और न्यूटन, लोकनाथ व आत्मा के बीच के संवाद लगातार एक चुटीलापन बनाए रखते हैं। चाहें तो इस फिल्म को कुछ हद तक एकब्लैक कॉमेडी के तौर भी देख सकते हैं। कुछ एक सिनेमाई छूटों और चूकों को नज़र अंदाज़ करते हुए देखें तो यह फिल्म लीक से हट कर बनने वाले सिनेमा की एक उम्दा मिसाल है।     निर्देशक अमित वी. मासुरकर के अंदर ज़रूर कोई सुलेमानी कीड़ा है जो उन्हें बार-बार लीक से हट कर फिल्में बनाने को प्रेरित करता है। अपनी पिछली फिल्म ‘सुलेमानी कीड़ा’ के बाद वह एक बार फिर अपनी प्रतिभा का बेहतरीन प्रदर्शनकरते हैं। एक्टिंग सभी की …

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