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रवीना टंडन और फाजिलपुरिया ने लांच किया नया वुडको पेंट

रवीना टंडन और फाजिलपुरिया ने लांच किया नया वुडको पेंट अभिनेत्री रवीना टंडन के साथ गायक फाजिलपुरिया हाल ही में वुडको द्वारा नए पर्यावरण अनुकूल पेंट्स की लॉन्चिंग के मौके पर दिल्ली में मौजूद थे। वुडको के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन जिंदल ने बताया कि वुडको के ये पेंट्स पर्यावरण के …

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Raid Movie Review

Raid Movie Review  रिव्यू-ऐसी ‘रेड’ ज़रूर पड़े, बार-बार पड़े -दीपक दुआ… फिल्म वाले अक्सर स्यापा करते हैं कि उनके पास नई और अच्छी कहानियां नहीं हैं। कैसे नहीं हैं? पुराणों-पोथियों को बांचिए, अपने आसपास की दुनिया को देखिए, बीते दिनों के अखबारी पन्नों को पलटिए तो जितनी कहानियां इस मुल्क में मिलेंगी उतनी तो कहीं मिल ही नहीं सकतीं।आखिर (‘एयरलिफ्ट’, ‘पिंक’ समेत कई फिल्में लिख चुके)रितेश शाह भी तो इन्हीं पन्नों से यह कहानी निकाल कर लाए ही हैं न। 80 के दशक के शुरू में उत्तर प्रदेश के कई शहरों में इन्कम टैक्स अफसरों ने कई चर्चित रेड डाली थीं। उन्हीं को आधार बना कर बुनी गई इस कहानी की पहली और सबसे बड़ी खासियत यही है कि पहले ही सीन से यह आपको अपने आगोश में ले लेती है और हल्की-फुल्की डगमगाहट के बावजूद आपका साथ नहीं छोड़ती। एक बाहुबली सांसद के यहां पड़े इन्कम टैक्स के छापे की इस कहानी में जो तनाव जरूरी होना चाहिए, वह पहले ही सीन से महसूस होने लगता है और लगातार आप उसे अपने भीतर पाते हैं कि अब आगे क्या होगा, कैसे होगा। कहीं-कहीं सिनेमाई छूट ली गई है लेकिन यह फिल्म ज्यादा फिल्मी हुए बिना आपको बांधे रखती है। अपनी ईमानदारी के चलते बार-बार ट्रांस्फर होने वाले सरकारी कर्मचारी की कहानियां हमलोग ‘सत्यकाम’ के जमाने से देखते आए हैं। खुद अजय देवगन हमें इस फिल्म से अपनी ही ‘गंगाजल’, ‘आक्रोश’ और ‘सिंघम’ की याद दिलाते हैं। लेकिन इन तीनों फिल्मों में वह पुलिस की वर्दी में थे जबकि ‘रेड’ समर्पित ही उन ईमानदार और साहसी अफसरों को की गई है जो बिना वर्दी के इस देश के विभिन्न महकमों में अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं। इस फिल्म के नायक का साहस अगर हमारी हिम्मत बढ़ाता है तो वहीं सांसद के घर से निकला करोड़ों का काला धन हमें संतुष्टि देता है। वही संतुष्टि जो हमें पर्दे पर हीरो के हाथों पिटते विलेन को देखकर मिलती है। ‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी अच्छी फिल्मों के बाद ‘घनचक्कर’ जैसी एक बेहद खराब फिल्म देने के पौने पांच साल बाद निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने इस फिल्म से जो सधी हुई वापसी की है, उससे वह उम्मीदें जगाते हैं। फिल्म के संवादों के लिए रितेश शाह तारीफ के हकदार हैं। ‘इंडिया के ऑफिसर्स का नहीं, उनकी बीवियों का बहादुर होना जरूरी है’जैसा संवाद और मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ का जिक्र बताता है कि उनकी कलम में अभी काफी स्याही बची है। फिल्म के किरदारों के अनुरूप कलाकारों के चयन के लिए अभिषेक बैनर्जी और अनमोल आहूजा की भी तारीफ जरूरी है। अजय देवगन एक बार फिर से फुल फॉर्म में हैं। संवादों, आंखों और चेहरे के हाव भाव से वह मारक अभिनय करते हैं।सांसद बने सौरभ शुक्ला लाउड होने की तमाम संभावनाओं के …

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Pari Movie Review

Pari: Not a Fairytale Movie Review  |3/5|   रिव्यू-‘परी’-कथा नहीं व्यथा है -दीपक दुआ…  किसी हाॅरर फिल्म से आखिर हमें क्या उम्मीद होती है? यही न कि उसमें कोई बुरी आत्मा होगी जो किसी के शरीर में घुस जाएगी। फिर वो उसे और उसके आस पास वालों को चैन से जीने नहीं देगी।कोई तांत्रिक, ओझा, पंडित, पादरी टाइप का बंदा आएगा। तंतर-मंतर होंगे, खून-खराबा होगा, फिर सब सही हो जाएगा।चलते-चलते एक सीन ऐसा भी आएगा कि फिल्म का सीक्वेल बन सके। पहले राम से भाइयों और इधर विक्रम भट्ट ने हमें हाॅरर फिल्मों के नाम पर जो अफीम चटाई है उसके नशे में हम किसी हाॅरर फिल्म से इससे कुछ हट कर दिखाने की उम्मीद भी नहीं करते हैं। यही कारण है कि अपने यहां हाॅरर के नाम पर सुपर नेचुरल चीजें ही ज्यादा आती हैं,साइक्लाॅजिकल नहीं। कोई रामगोपाल वर्मा इस रास्ते पर चलना भी चाहता है तो किनारे कर दिया जाता है। खैर, अनुष्का शर्मा की यह फिल्म ‘परी’ हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है जिसमें सुपर नेचुरल बातें होने के बावजूद इंसानी पहलुओं को नजर अंदाज नहीं किया गया है। बतौर निर्माता अनुष्का शर्मा अभी तक की अपनी तीनों फिल्मों-‘एन.एच.10’, ‘फिल्लौरी’ और अब ‘परी’ से अपनी एक अलहदा जमीन तलाश रही हैं। स्वाभाविक है कि इस तलाश में उन्हें ठोकरें भी मिलेंगी लेकिन उनकी इस हिम्मत की तारीफ बनती है कि मसाला सिनेमा के पाले से आने के बावजूद वह एक अनदेखे, अनजाने मैदान में पांव टिकाने की कोशिशें कर रही हैं। प्रोसित राॅय के निर्देशन में संभावनाएं दिखती हैं। अनुष्का शर्मा अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं तो प्रमब्रत चटर्जी अंडरप्ले करते हुए असर छोड़ते हैं। रजत कपूर, ऋताभरी चक्रवर्ती, दिब्येंदु भट्टाचार्य व तमाम दूसरे कलाकार उम्दा काम करते दिखे हैं। कैमरे के दृष्टि और बैकग्राउंड म्यूजिक से अपेक्षित असर सामने आ पाया है। कोलकाता शहर की बारिश भी इसमें एक किरदार के तौर पर दिखती है और जेहन में बाकी रह जाती है। इस फिल्म की कहानी आम दर्शकों के लिए थोड़ी क्न्फ्यूजन भरी हो सकती है। डराने वाले दृश्यों से ज्यादा दहलाने वाले दृश्यों का होना भी हाॅरर पसंद करने वालों को अखर सकता है।कहानी का ट्रीटमैंट लीक से हट कर है और मुमकिन है नींबू-मिर्ची की आदत लगा बैठे दर्शकों को यह न पसंद आए। लेकिन अगर सचमुच हाॅरर के दायरे में कुछ हट कर देखने का मन हो,कुछ मैच्योर किस्म का समझ में आता हो तो यह फिल्म आपको पसंद आएगी और याद भी …

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