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Pakhi Movie Review    रिव्यू-रूखी-सूखी ‘पाखी’ -दीपक दुआ… एक कोठा। उसका एक खूंखार मालिक। कुछ लड़कियां। कोई हंस कर तो कोई रो कर अपने ‘काम’ को करती लड़कियां। वहां लड़कियां बेच कर जाते हैं लोग। कोई अपनी प्रेमिका, कोई भतीजी तो किसी और को बेच जाता है वहां। लेकिन जब …

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Paltan Movie Review

Paltan Movie Review   रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’ -दीपक दुआ…  कुछ सैनिक।उनके परिवारों की कहानियां। सरहदपर एक सच्चीलड़ाई। जोश,जज़्बा, देशप्रेम…बन गई ‘बॉर्डर’।एक उम्दा,क्लासिक वाॅर-फिल्म। फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एकसच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात… बन गई ‘एल.ओ.सी. कारगिल’। क्लासिकन सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म। एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां।एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव… बन गई ‘पलटन’। लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न। एक ही फ़ॉर्मूले पर और एक ही शैलीमें कई सारी फिल्में बनाना कोई गलत नहीं।लगभग हर फिल्मकार ने ऐसाकिया है, करता है। लेकिन अगर आपके फ़ॉर्मूले का गाढ़ापन कम और आपकी शैली की धारभोथरी होती चली जाए तो फिर ऐसी ही फिल्में बनेंगी, जो ज़रूरी होते हुए भीकमज़ोर होंगी, नाकाबिल-ए-तारीफ होंगी। अपने यहां की युद्ध आधारित फिल्मों में हमारा दुश्मन आमतौर पर पाकिस्ता नही रहा है जबकि सच यह भी है भारत-चीन के संबंध भी कभी बहुत मीठे नहीं रहे, आज भी नहीं है। चेतन आनंद की ‘हकीकत’ ज़रूर 1962 के भारत-चीन युद्ध की बात करती है लेकिन उस लड़ाई में चीन के हाथों बुरी तरह से हारने के पांचसाल बाद नाथू ला और चो ला की लड़ाई की कहानी तो शायद इतिहास के छात्रों को भी न याद हो। जे.पी. दत्ता की यह फिल्म उसी नाथू ला की लड़ाई के बारे मेंहै जिसमें अगर भारतीय सेना न जीती होती तो मुमकिन है कि आज सिक्किमका नाम चीनी नक्शे में होता। लेकिन वह लड़ाई आमलड़ाइयों जैसी नहीं थी। एक-दूसरे से चंद मीटर की दूरी पर बैठे हिन्दुस्तानी और चीनी सिपाही वहां गोलियों से नहीं बल्कि गालियों, धक्कों,पत्थरों से लड़ रहे थे। कहसकते हैं कि वह लड़ाई शारीरिक से ज़्यादा मानसिक तौर पर लड़ी जा रही थी। दत्ता ने उसे पूरी ईमानदारी से दिखाया भी है। लेकिन इस किस्म की फिल्म में जो नाटकीयता, जो आक्रामकता, जो व्यापकता और जो विशालता होनी चाहिए (जिसकी लत भी हमें दत्ता ने ही लगाई), उसकी कमीइस फिल्म को सर्वदा शक्तिशाली होने से रोक देती है। सैनिकों की बैक-स्टोरी काउसी पुराने घिसे-पिटे स्टाइल में होना, दमदार संवादों की कमी और सबसे बढ़कर दमदार अभिनेताओं की कमी भी इस फिल्म को सिर्फ एक औसत फिल्म ही बना पाती है। क्लाइमैक्स में शहीद सैनिकों के अस्थि-कलशों का घर आनाआंखें नम करता है। हालांकि सभीकलाकारों की मेहनत दिखती है लेकिन ऊपर वालेने उन बेचारों की रेंज ही सीमित बनाई हैतो वो भी क्या करते। फिल्म में कई जगह चीनी संवादों के नीचे अंग्रेज़ी में सब-टाइटल हैं। क्यों जी, हिन्दी कीचंद लाइनें भी तो हो सकती थीं। या फिर चीनी ही रहने देते। आखिर ‘इन्दी-चीनी बाई-बाई’ ही तो हैं। गीत-संगीत अच्छा होते हुए भी दिल में नहीं उतरपाता। दिल में तो खैर, यह पूरी फिल्म ही नहीं उतर पाती। पर हां, इस तरह की कहानियां कही जानी चाहिएं। वरना वक्त की धूल हमारे इतिहास को धुंधला करती जाएगी और पता भी नहीं चलेगा।     अपनी रेटिंग–दो स्टार     …

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Laila Majnu Movie Review

Laila Majnu Movie Review रिव्यू-कचरा लव-स्टोरी है ‘लैला मजनू’ -दीपक दुआ… दो परिवार। दोनों में अदावत। दोनों के बच्चे आपस में प्यार कर बैठे। घरवालों ने उन्हें जुदा कर दिया तो दोनों ने एक-दूसरे के लिए तड़पते हुए जान दे दी। यही तो कहानी थी ‘लैला मजनू’ की। इसी कहानी पर बरसों से …

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