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Sonu Ke Titu Ki Sweety Movie Review { 3.5/5 }

Sonu Ke Titu Ki Sweety Movie Review { 3.5/5 }  रिव्यू-‘चुटीले’ सोनू के ‘प्यारे’ टीटू की ‘करारी’ स्वीटी -दीपक दुआ… बचपन के दो दोस्त सोनू और टीटू। पक्के याड़ी। टीटू रोए तो सोनू चुप कराए। टीटू को लड़की गलत मिली तो सोनू ने ब्रेकअप करवा दिया। जब टीटू की शादी …

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Kuch Bheege Alfaaz Movie Review

 Kuch Bheege Alfaaz  Movie Review (3/5)   रिव्यू-मन को नम करते ‘कुछ भीगे अल्फाज़’ -दीपक दुआ… कभी ऐसा भी होता है न कि रेडियो सुनते-सुनते किसी आर.जे. के साथ इश्क हो जाए? इश्क न सही, उस आर.जे. के साथ, उसके अल्फाज़ों के साथ, एक राब्ता-सा तो जुड़ने ही लगता है।निर्देशक …

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Aiyaary Movie Review (1/5)

Aiyaary Movie Review रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’ –दीपक दुआ…  ‘अय्यारी’ का मतलब क्या होता है? पिछले दिनों जिस किसी के भी सामने इस फिल्म का जिक्र हुआ तो यह सवाल सबसे पहले पूछा गया। यानी आप बिना आगे कुछ पढ़े यह समझ लीजिए कि कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने नाम से ही पिटने लगती हैं। ‘अय्यारी’ उन्हीं में से एक है। खैर, ‘अय्यारी’ या ‘अय्यार’ शब्द का मेरी जानकारी में इकलौता इस्तेमाल बाबू देवकी नंदन खत्री के ‘चंद्रकांता’ सीरिज के उपन्यासों में मिलता है। राजा-महाराजों द्वारा नौकरी पर रखे जाने वाला ऐसा गुप्तचर जो जरूरत पड़ने पर पल भर में रूप बदलने, घोड़े से भी तेज दौड़ने,किसी को तुरंत काबू करने, बेहोश को होश में लाने जैसे ढेरों ऐसे फन जानता हो जो उसे काबिल गुप्तचर बनाते हों। अब बात इस फिल्म की। कहानी कुछ यूं है कि… छोड़िए, बड़ी ही उलझी हुई कहानी है। मेरा तो दिमाग घूम गया। इतनी करवटें, इतनी सिलवटें, इतनी परतें, इतने मोड़ कि आप अपने बाल नोंच डालें कि भैय्ये, कहना क्या चाहते हो? जो कहना चाहते हो, सीधे-सीधे कह दो, नहीं तो घुमा-फिरा कर कह दो, यह जलेबियां क्यों बना रहे हो भाई? चलिए ट्रीटमैंट की बात कर लेते हैं। अपने फ्लेवर से ‘एक था टाईगर’, ‘फैंटम’, ‘बेबी’, ‘हाॅलीडे’, ‘स्पेशल 26’, ‘बेबी’, ‘नाम शबाना’, ‘रुस्तम’ जैसी लगती इस फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। बल्कि ऐसा लगता है कि नीरज ने ऐसे मिजाज की फिल्मों में से थोड़ा-थोड़ा चुरा कर अपनी ‘अय्यारी’ से उन्हें रूप बदल कर परोस दिया है। भारतीय सेना के अंदर के भ्रष्टाचार, सफेद कॉलर में देश को बेचने निकले सौदागरों और रक्षा-सौदों से पैसे बना रहे लोगों के साथ-साथ मुंबई के आदर्श सोसायटी घोटाले जैसे भारी-भरकम मुद्दों को एक साथ समेटती इस फिल्म में बहुत कुछ कहने-दिखाने की गुंजाइश थी लेकिन यह हर मोर्चे पर औंधे मुंह गिरी है। इसे देखते हुए न आप चौंकते हैं, न दहलते हैं, न आपकी मुठ्ठियां भिंचती हैं, न आपके अंदर देश प्रेम हिलोरे मारता है, न आपभावुक होते हैं, न आपको गुस्सा आता है, न आपको यह उदास करती है। सच तो यह है कि …

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