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HALKAA Movie Review

HALKAA Movie Review     रिव्यू-‘हल्का’-एक हल्की टॉयलेट कथा -दीपक दुआ…  दिल्ली की एक झोंपड़पट्टी।गरीबी, अशिक्षा,गंदगी, कीचड़। कोई टॉयलेट नहीं। नज़दीक की रेलवे लाइन पर ‘हल्के’ होते सब लोग। टॉयलेट के लिए मिलने वाले सरकारी पैसे से ऐश करते लोग। उस पैसे को देने की एवज में रिश्वत मांगते सरकारी अफसर। स्कूल जाने की बजाय कचरा बीनते बच्चे।इन्हीं बच्चों में से एक पिचकू। सबके सामने ‘हल्का’ होने में उसे शर्म आती है।पिता टॉयलेट बनवाने को तैयार नहीं। बच्चा खुद ही यह बीड़ा उठाता है। कहने को स्वच्छ भारत और शौचालय की ज़रूरत की बात करती है यह फिल्म।लेकिन इस बात को कहने के लिए जिस किस्म की कहानी ली गई है, वह सिरेसे पैदल है और उस पर जो स्क्रिप्ट तैयार की गई है, वो निहायत ही बचकानी है। ‘हल्के’ होते समय किसी इंसान की निजता और गरिमा को बनाए रखने कीज़रूरत की बात इसमें सिर्फ नज़र आती है, महसूस नहीं होती। पूरी बस्ती के लोग, मर्द, औरतें, बच्चे रेल की पटरी पर ‘हल्के’ होते हैं लेकिन किसी को अपनी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं। और वह बच्चा भी कोई अलख नहीं जगा रहा है,बस, पैसे जोड़-जोड़ कर एक टॉयलेट बनाने की जुगत में है। एक महंगे स्कूल मेंपढ़ने वाले अमीर बच्चे उसकी जिस तरह से मदद करते हैं, वो मदद कम और भीख ज़्यादा लगती है। इसी महंगे स्कूल के पैसे से बनी फिल्म से और भला उम्मीद हो भी क्या सकती थी? ज़मीन से जुड़ी इस कहानी का प्रवाह बहुत ही बनावटी है और यही कारण है कि इसे देखते हुए आप इससे जुड़ नहीं पाते। फिर ‘हल्के’ होने के सीन इसमें इस कदर विस्तार से हैं कि इसे देखते समय कोफ्त होने लगती है। दिल्ली पर ढेरों फिल्में आई हैं। लेकिन दिल्ली की इतनी खराब तस्वीर शायद ही किसी फिल्म में आई हो। और हां, इसे देखने के दौरान कुछ खाने-पीने की तो आप सोच भी नहीं सकते। क्यों कि, सोच के आगे… शौच है। हैरानी और अफसोस इस बात का भी है कि यह फिल्म उन नीला माधव पांडाकी है जो ‘आई एम कलाम’, ‘जलपरी’ और ‘कड़वी हवा’ जैसी असरदार फिल्म बना चुके हैं। असर तो उन्होंने इसमें भी भरपूर डालने की कोशिश की लेकिन अपनी हल्की कहानी, हल्के सैट अप और उतने ही हल्के डायरेक्शन के चलते यह एक बहुत ही हल्की फिल्म बन कर रह गई। इस पर तो 20-30 मिनट कीशॉर्ट-फिल्म बनाई जानी चाहिए थी, बस। रणवीर शौरी, पाओली दाम, कुमुद मिश्रा, किसी की भी एक्टिंग दिल को नहीं छू पाती क्यों कि उनके किरदारों में हीदम नहीं है। पिचकू बने तथास्तु का काम साधारण है। म्यूज़िक, कैमरा भी सबहल्का रहा। सिर्फ अपने विषय के चलते यह फिल्म कहीं पुरस्कार भले बटोर लेलेकिन असल में यह फिल्म एक दुरुपयोग है-पैसों का, संसाधनों का, वक्त का,एक अच्छे फिल्मकार की उर्जा का और सबसे बढ़ कर सिनेमा का।     …

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Gold Movie Review 2018

Gold Movie Review   रिव्यू-फीकी चमक वाला ‘गोल्ड’  -दीपक दुआ…  1936 के बर्लिन ओलंपिक में गुलाम भारत यानी ब्रिटिश इंडिया की हॉकी टीम ने गोल्ड मैडल तो जीता लेकिन स्टेडियम में ब्रिटेन का राष्ट्र गान बज रहा था। देश आज़ाद हुआ तो उसी टीम के जूनियर मैनेजर ने सपना देखा कि 1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम ‘दो सौ साल की गुलामी’ के बाद जीते और अपने ‘जन गण मन…’की धुन पर गोल्ड लेकर आए। और बस, वो जुट गया तमाम बाधाओं के बीच एक जानदार टीम तैयार करने में जो एक शानदार जीत हासिल कर सके। यह सही है कि 1948 में भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ब्रिटेन को उसी के घर में 4-0 से हरा कर गोल्ड जीता था। लेकिन इतिहास यह नहीं बताता कि वो सपना किसी टीम-मैनेजर का था। लेकिन यह फिल्म है जनाब, जो इतिहास के कुछ सच्चे किस्सों में ढेर सारी कल्पनाएं मिला कर आपको देश प्रेम की ऐसी चाशनी चटाती है कि आप बिना कुछ आगा-पीछा सोचे बस, उसे चाटते चले जाते हैं। फिल्म अपने कलेवर से ‘चक दे इंडिया’ और ‘लगान’ सरीखी लगती है। लेकिन अपने तेवर से यह उनके पांव की धूल भी साबित नहीं हो पाती। ‘चक दे इंडिया’ का कोच कबीर खानखुद पर लगे दाग को साफ करने के लिए लौटा है। ‘लगान’के खिलाड़ी अपनी दासता के दर्द पर जीत का मरहम लगाना चाहते हैं। लेकिन यहां टीम-मैनेजर तपन दास क्यों बावलों की तरह खुद को, अपने पैसों को,अपनी पारिवारिक ज़िंदगी को हॉकी की टीम खड़ा करने में डुबो रहा है, फिल्म यह बताना ज़रूरी नहीं समझती। एक तरफ उसके किरदार को पियक्कड़, धोखेबाज़,खिलंदड़ दिखाया जाना और दूसरी तरफ देश के प्रति अचानक से जगने वाला समर्पण अजीब-सा लगता है। बेहतर होता कि तपन की किसी बैक-स्टोरी से कोई पुख्ता आधार बनाया जाता और उस पर कहानी की इमारत खड़ी होती। फिल्म की स्क्रिप्ट भी कई गैर ज़रूरी और लंबे दृश्यों के कारण बार-बार हिचकोले खाती है। कुछ एक मिनट की कटाई-छंटाई इसे और बेहतर बना सकती थी। हालांकि कहानी लगातार आगे की तरफ चल रही है, तपन के टीम को बनाने की मेहनत,आज़ादी और मुल्क के बंटवारे के बाद टीम के कई सदस्यों का हिन्दुस्तान से चले जाना, तपन का एक नई टीम बनाना, लंदन में पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी खिलाड़ियों का एक-दूजे को सपोर्ट करना जैसे सीक्वेंस लुभाते तो हैं लेकिन ज़्यादा मजबूती से बांध नहीं पाते। क्लाइमैक्स में होने वाले मैच में भारत के जीतने और उधर स्टेडियम व इधर थिएटर में लोगों के खड़े होने ने रोमांचित करना ही था, सो किया।   यह फिल्म इतना तो बताती ही …

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Satyameva Jayate Movie Review

Satyameva Jayate  Movie Review   रिव्यू-‘सत्यमेव जयते’-असली मसाले सच-सच -दीपक दुआ…  एक सीन देखिए। एक करप्ट पुलिस अफसर एक मां से कहता है तू यहां नमाज़ पढ़,अंदर मैं तेरे बेटे को मारता हूं।देखता हूं तेरा अल्लाह उसे कैसे बचाएगा। नमाज़ खत्म होने तक अपना हीरो आकर उस पुलिस वाले को मार देता है। दूसरा सीन देखिए। एक और करप्ट पुलिस अफसर मोहर्रम के दिन एक मुस्लिम लड़की की इज़्ज़त पर हमला करता है। अपना हीरो आकर उस पुलिस वाले को मोहर्रम के मातम के बीच मार देता है। आप कहेंगे कि यह फिल्म तो सिर्फ मुस्लिम दर्शकों को खुश करने के लिए बनाई गई है। ऐसा नहीं है जनाब, जब भी अपना हीरो किसी करप्ट पुलिस अफसर को मारता है तो पीछे से शिव तांडव स्तोत्र बजने लगता है। लीजिए, हो गए न हिन्दू दर्शक भी खुश…? हीरो चुन-चुन कर करप्ट पुलिस अफसरों को मारता है। मारता ही नहीं,जलाता भी है।क्यों? इसके पीछे उसकी अपनी एक स्टोरी है। दूसरा हीरो यानी ईमानदार डी.सी.पी.उसे पकड़ने की फिराक में है और उसकी भी अपनी एक स्टोरी है। हीरो के पास हीरोइन है जिसकीएक और स्टोरी है। इसके बाद होता यह है कि… छोड़िए न, क्या फर्क पड़ता है किक्या होता है, कैसे होता है। जिस फ्लेवर की यह फिल्म है उसमें स्टोरी की क्वालिटी से ज़्यादा मसालों का तीखा पन देखा जाता है और वो इस फिल्म में प्रचुर मात्रा में छिड़का गया है। कहानी ठीक-ठाक सी है जिस पर लिखी स्क्रिप्ट पैदल होने के बावजूद आम दर्शकों को लुभाने का दम रखती है। भ्रष्ट पुलिस वालों को ‘न केस न तारीख, सीधे मौत की सज़ा’ टाइप की फिल्में अपने यहां अक्सर आती हैं और उन्हें आम दर्शकों की तालियां-सीटियां भी मिलती हैं। पर्दे पर ही सही, हीरो के हाथों भ्रष्ट लोगों को मारे जाते देखने का अपना एक अलग ही सुख होता है और यह सुख इस फिल्म को देखते हुए भी बार-बार मिलता है। इस किस्म की फिल्मों में डायलॉग भी ऐसे ही रखे जाते हैं जो सिंगल-स्क्रीन थिएटरों और छोटे सैंटर्स में तालियां पा सकें। एक्शन ज़बर्दस्त भले न हो, दहलाता तो है ही। जॉन अब्राहम अपनी रेंज में रहकर ठीक-ठाक काम कर लेते हैं। मनोज वाजपेयी भी अपना दम दिखा देते हैं। अमृता खान विलकर जैसी अदाकारा के टेलेंट को फिल्म ज़ाया करती …

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