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May, 2018

  • 25 May

    ताइवान-भारत में बढ़ते कारोबारी संबंध

    ताइवान-भारत में बढ़ते कारोबारी संबंध पूर्वी एशिया के समुंदर में स्थित छोटे-से देश ताइवान से भारत के कारोबारी संबंध लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। पिछले साल के अंत में भारत और ताइवान ने एक-दूसरे के साथ व्यापारिक रिश्ते प्रगाढ़ बनाने की दिशा में एक सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। …

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  • 25 May

    Bioscopewala Movie Review

    Bioscopewala Movie Review  रिव्यू-अहसान उतारती है ‘बायोस्कोपवाला’ -दीपक दुआ… टैगोर की अमर कहानी ‘काबुलीवाला’ बताती है कि अफगानिस्तान से आया पठान (काबुलीवाला) कलकत्ते की गलियों में मेवे बेचता है, पैसे उधार देता है, छोटी-सी मिनी में अपनी बेटी की झलक देखता है, अपने मुल्क लौटना चाहता है, किसी को चाकू …

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  • 19 May

    जज़्बातों का सफर ज़ी टी.वी. पर

    जज़्बातों का सफर ज़ी टी.वी. पर आप इसे संघर्ष और उपलब्धियों का सफर कह सकते हैं, या जीवन भर का एक शानदार अनुभव, या पुरानी यादों का लम्हा, या फिर आपके सबसे पसंदीदा सेलिब्रिटीज़ की जिंदगी की सबसे प्रेरणादायक बातें। उनके इस उतार-चढ़ाव भरे सफर से जुड़ा हर रोमांच, जिसमें …

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  • 19 May

    तितिक्षा स्कूल का अलंकरण समारोह

    तितिक्षा स्कूल का अलंकरण समारोह दिल्ली के रोहिणी स्थित तितिक्षा पब्लिक स्कूल का अलंकरण समारोह बेहद भव्य तरीके से मनाया गया। इस अवसर पर पद्मभूषण से सम्मानित पहलवान महाबली सतपाल और ओलंपिक विजेता पद्मश्री सुशील कुमार बतौर चीफ-गैस्ट उपस्थित थे। विभिन्न क्षेत्रों की अन्य कई हस्तियों के साथ फिल्म समीक्षक …

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  • 7 May

    सुनहरे दौर के किस्से सुनाएंगे दीपक दुआ

    सुनहरे दौर के किस्से सुनाएंगे दीपक दुआ किस्सागोई की परंपरा अब डिजिटल रूप ले चुकी है। महफिलों से उठ कर रेडियो तक पहुंची किस्सागोई अब मोबाइल ऐप्स के जरिए हर किसी की पहुंच में है। यही कारण है कि स्वीडन मूल की कंपनी ‘स्टोरीटेल’ का ऐप काफी पसंद किया जा …

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April, 2018

  • 22 April

    Nanu Ki Jaanu Movie Review

    Nanu Ki Jaanu Movie Review  रिव्यू-रायता बनाना सिखाती है ‘नानू की जानू’ -दीपक दुआ…  लड़की का पिता आलू के परांठे बना रहाथा। वह दही लेने घर से निकली। एक्सीडेंट हुआ। मर गई। जिस लड़के ने उसे अस्पताल पहुंचाया, उसी के घर भूतनी बन कर पहुंच गई। लड़का गुंडागर्दी करता था। अब वह बदलने लगा। धमकाने की बजाय मिमियाने लगा। लड़की को हिट करने वाले को तलाशने लगा। राज़ खुला कि लड़की की आत्मा क्यों भटक रही थी।अंत में उसे मुक्ति मिल गई। यह फिल्म देखने के बाद ख्याल आता है कि लड़की दही ले आती तो बाप-बेटी परांठे-दही खा लेते। न कोई बवाल मचता, न यह फिल्म बनती। मगर नहीं। लड़की दही लेकर नहीं लौटी और रायता बन गया-कहानी का भी और फिल्म का भी। कॉमेडी फिल्में लगभग हर किसी को पसंद आती हैं। हॉरर फिल्मों के दीवानों की गिनती भी बहुत है। लेकिन इन दोनों स्वादों को मिला कर हॉरर-कॉमेडी बनाना कोई हंसी-खेल नहीं।सतीश कौशिक जैसा निर्देशक ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ में मात खा चुका है। अनुष्का शर्मा वाली ‘फिल्लौरी’ भी हॉरर और कॉमेडी के घालमेल में कुछ ठोस नहीं कह पाई थी। यही दिक्कत इस फिल्म के साथ भी है। पहली प्रॉब्लम तो इसके नाम के साथ है। सुन कर लगता है कि किसी नाना और उसकी दोहती की कहानी कहती बच्चों की फिल्म होगी। वह भी होती तो सही था। यहां तो बचकानी फिल्म निकली। हीरो का नाम नानू है। तुक मिलाने के लिए साथ में जानू जोड़ दिया है जबकि लव-शव वाला कोई चक्कर न तो दिखता है, न समझ में आता है। वैसे यह एक तमिल फिल्म का रीमेक है। इसकी कहानी को उस फिल्म से अलग करने के लिए मनु ऋषि ने मेहनत भी की है लेकिन नतीजा औसत से ऊपर नहीं आ पाया है। स्क्रिप्ट में मुद्दे की बातें कम हैं, बिखरी हुई हैं और ज्यादा प्रभावी भी नहीं हैं। अब कहने को यह फिल्म बहुत कुछ कहती है। किसी का मकान किराए पर लेकर उसे कब्जाने और मकान-मालिक को धमका कर उसे बेचने पर मजबूर करने का ‘बिजनेस’ सिखाती है। ड्राइविंग के समय मोबाइल के इस्तेमाल न करने, स्कूटर चलाते समय हेलमेट पहनने, सड़क-हादसे में दूसरों की मदद करने, पड़ोस की बच्ची के लिए चॉकलेट लाने, घरेलू हिंसा को न सहने, सिगरेट-शराब न पीने, तंतर-मंतर करने वालों पर भरोसा न करने, माता के जागरण में ढोंग से बचने… जैसी चार सौ छप्पन बातें हैं इस फिल्म में। कहीं-कहीं हल्का-सा हॉरर और थोड़ी-बहुत कॉमेडी भी है। बस, नहीं है तो उम्दा मनोरंजन। नहीं है तो कोई ठोस बात। नहीं है तो वह पकड़ जो आपको बांधे रख सके। अब नहीं है, तो नहीं है।   अभय देओल उम्दा रहे हैं। नायिका पत्रलेखा ठंडी लगीं। भूतनी बनने के बाद …

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  • 4 April

    पुरुष भी टूट कर प्यार कर सकता है

    पुरुष भी टूट कर प्यार कर सकता है -दीपक दुआ   दिल्ली में जन्मे मगर दुबई और न्यूजीलैंड में पले-बढ़े मोहित मदान को एक्टिंग का शौक मुंबई खींच लाया। बचपन से ही अपने भीतर हिन्दी फिल्मों का नशा महसूस कर चुके मोहित यहां काफी सारे विज्ञापनों के अलावा राज शैट्टी …

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  • 2 April

    अभिनय के लिए आॅब्जर्वेशन और रिसर्च वर्क जरूरी

    अभिनय के लिए आॅब्जर्वेशन और रिसर्च वर्क जरूरी –गोविंद नामदेव मध्यप्रदेश के सागर में जन्मे और दिल्ली के नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा में एक लंबा समय बिताने के बाद मुंबई की रंग-बिरंगी दुनिया में नाम कमाने वाले अभिनेता गोविंद नामदेव का ध्यान अब फिल्मों में अभिनय करने से ज्यादा अभिनय सिखाने पर …

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  • 2 April

    Baaghi 2 Movie Review

    Baaghi 2 Movie Review    रिव्यू-‘बागी 2’ अझेल भेल रेलमपेल -दीपक दुआ…  ‘बागी 2’ का शो शुरू होने से पहले ही मैं थिएटर की कैंटीन से भेलपूरी की प्लेट ले आया था। बड़ी वाली। बंदे ने बड़े ही उत्साह से एक भगौने में कई तरह की नमकीन, सेव,मुरमुरे, चिप्स, नमक, 2-3 किस्म के मसाले,3-4 किस्म …

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March, 2018

  • 24 March

    Hichki Movie Review

    Hichki Movie Review  रिव्यू-च्च…च्च…‘हिचकी’, वाह…वाह…‘हिचकी’ -दीपक दुआ…  एक नामी स्कूल। होशियार बच्चे। काबिल टीचर। कुछ बच्चे नालायक। न वे पढ़ना चाहते हैं न उन्हें कोई पढ़ाना चाहता है। एक नया टीचर आता है। बाकियों से अलग।पढ़ाने का ढंग भी जुदा।नालायक बच्चे उसे भगाने की साज़िशें करते हैं। लेकिन वह डटा रहता है, टिक जाता है और उन्हीं नालायक बच्चों को होशियार बना देता है। इस कहानी में नया क्या है? कुछ भी नहीं। ‘जागृति’ और ‘परिचय’ से लेकर ‘तारे जमीन पर’ तक में कमोबेश ऐसी कहानियां हम देखते आए हैं। मगर इस फिल्म में नया यह है कि यहां स्कूल में आई नई टीचर खुद एक अजीब-सी बीमारी या आदत से ग्रस्त है जिसे ‘टूरैट सिंड्रोम’कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अपने शरीर की कुछ आवाज़ों और हलचलों पर नियंत्रण नहीं रहता।जैसे नैना के मुंह से अक्सर ‘च्च… च्च… वा… वा…’ की आवाज़ें निकलती रहती हैं। बचपन से लेकर उसने अब तक इसकी वजह से बहुत कुछ झेला है और अब इन नालायक बच्चों को पढ़ाने की चुनौती स्वीकार करने के बाद उसे उनसे ही नहीं, अपनी इन आवाज़ों से भी जूझना है। शुरूआत में लगता है कि यह फिल्म नैना के टूरैट सिंड्रोम से भिड़ने और जीतने की कहानी दिखाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। यह फिल्म वही पुरानी कहानी दिखाती है जिसमें किताबी तरीकों से बच्चों को पढ़ा रहे किसी अनुभवी टीचर के मुकाबले अनूठे ढंग से पढ़ाने वाले एक नए टीचर की जीत दिखा दी जाती है। जिसमें नालायक समझे जाने वाले बच्चे उस टीचर का साथ पाकर जिम्मेदारी महसूस करने लगते हैं। यह फिल्म एक साथ कई बातें सिखाती है। किसी शारीरिक या मानसिक समस्या से ग्रस्त बच्चे के साथ उसके परिवार वालों और समाज को कैसे पेश आना चाहिए से लेकर नालायक समझे जाने वाले बच्चों के साथ उनके टीचर्स को कैसा बर्ताव करना चाहिए तक की सीखें यह देती है। लेकिन दिक्कत यही है कि इन सारी बातों में नयापन नहीं दिखता। फिर जिस तरहसे हालात तेजी से बदलते हैं उससे सब कुछ ‘फिल्मी-सा’ भी लगने लगता है। हमें पहले ही यह आभास हो जाता है कि जो पहले नालायक हैं, बाद में वही होशियार निकलेंगे। कहानी का बेहद बारीक धागे पर टिके होना फिल्म को हल्का बनाता है। घटनाओं और चैंकाने वाले पलों का लेप लगा कर इसे और वजनी बनाया जाना चाहिए था। ‘वी आर फैमिली’ दे चुके निर्देशक सिद्धार्थपी. मल्होत्रा के डायरेक्शन में काफी परिपक्वता आई है। लेकिन कमाल तोकिया है इस फिल्म के तमाम कला का रोंने। रानी मुखर्जी अद्भुत काम कर गई हैं।नीरज कबी बेहद प्रभावी रहे। सचिन औरउनकी पत्नी सुप्रिया पिलगांवकर, आसिफबसरा, शिव सुब्रह्मण्यम, कुणाल शिंदे, स्पर्श खनचंदानी, रिया शुक्ला और तमाम बच्चे उम्दा रहे। ‘आई एम कलाम’ में आचुके और इस फिल्म में आतिश बने हर्ष मयार में एक ज़बर्दस्त आग है। आने वाले वक्त में यह लड़का कमाल करेगा। गीत-संगीत फिल्म के मिजाज के मुताबिक है। यह फिल्म टूरैट सिंड्रोम से ज्यादा शिक्षा व्यवस्था के बारे में बात करती है। बुरे, अच्छे,समझदार और परफैक्ट टीचर के बीच का फर्क बताती है। हां, आंखें भी नम करती है और समझाती-सिखाती भी है। पहले हिस्से में ठंडी-सूखी रह कर दूसरे हाफ में उड़ान भी भरती है।बस, चौंकाती नहीं है, कुछ नया देते-देते थम जाती है और इसी वजह से मास्टरपीस नहीं बन पाती।       …

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