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March, 2018

  • 18 March

    दीप्ति वर्मा को मिला सम्मान

    पुलिज़िया इंडस्ट्रीज, मुंबई की डायरेक्टर दीप्ति वर्मा को हाल ही में ह्यूमैनिटी एनजीओ और आदित्य बिड़ला मैमोरियल अस्पताल ने यंग अचीवर्स एंटरप्रेन्योर अवार्ड से सम्मानित किया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों से 26 महिलाओं को इस पुरस्कार से नवाजा गया। दीप्ति को यह सम्मान बिजनेस …

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  • 18 March

    रवीना टंडन और फाजिलपुरिया ने लांच किया नया वुडको पेंट

    रवीना टंडन और फाजिलपुरिया ने लांच किया नया वुडको पेंट अभिनेत्री रवीना टंडन के साथ गायक फाजिलपुरिया हाल ही में वुडको द्वारा नए पर्यावरण अनुकूल पेंट्स की लॉन्चिंग के मौके पर दिल्ली में मौजूद थे। वुडको के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन जिंदल ने बताया कि वुडको के ये पेंट्स पर्यावरण के …

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  • 16 March

    Raid Movie Review

    Raid Movie Review  रिव्यू-ऐसी ‘रेड’ ज़रूर पड़े, बार-बार पड़े -दीपक दुआ… फिल्म वाले अक्सर स्यापा करते हैं कि उनके पास नई और अच्छी कहानियां नहीं हैं। कैसे नहीं हैं? पुराणों-पोथियों को बांचिए, अपने आसपास की दुनिया को देखिए, बीते दिनों के अखबारी पन्नों को पलटिए तो जितनी कहानियां इस मुल्क में मिलेंगी उतनी तो कहीं मिल ही नहीं सकतीं।आखिर (‘एयरलिफ्ट’, ‘पिंक’ समेत कई फिल्में लिख चुके)रितेश शाह भी तो इन्हीं पन्नों से यह कहानी निकाल कर लाए ही हैं न। 80 के दशक के शुरू में उत्तर प्रदेश के कई शहरों में इन्कम टैक्स अफसरों ने कई चर्चित रेड डाली थीं। उन्हीं को आधार बना कर बुनी गई इस कहानी की पहली और सबसे बड़ी खासियत यही है कि पहले ही सीन से यह आपको अपने आगोश में ले लेती है और हल्की-फुल्की डगमगाहट के बावजूद आपका साथ नहीं छोड़ती। एक बाहुबली सांसद के यहां पड़े इन्कम टैक्स के छापे की इस कहानी में जो तनाव जरूरी होना चाहिए, वह पहले ही सीन से महसूस होने लगता है और लगातार आप उसे अपने भीतर पाते हैं कि अब आगे क्या होगा, कैसे होगा। कहीं-कहीं सिनेमाई छूट ली गई है लेकिन यह फिल्म ज्यादा फिल्मी हुए बिना आपको बांधे रखती है। अपनी ईमानदारी के चलते बार-बार ट्रांस्फर होने वाले सरकारी कर्मचारी की कहानियां हमलोग ‘सत्यकाम’ के जमाने से देखते आए हैं। खुद अजय देवगन हमें इस फिल्म से अपनी ही ‘गंगाजल’, ‘आक्रोश’ और ‘सिंघम’ की याद दिलाते हैं। लेकिन इन तीनों फिल्मों में वह पुलिस की वर्दी में थे जबकि ‘रेड’ समर्पित ही उन ईमानदार और साहसी अफसरों को की गई है जो बिना वर्दी के इस देश के विभिन्न महकमों में अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं। इस फिल्म के नायक का साहस अगर हमारी हिम्मत बढ़ाता है तो वहीं सांसद के घर से निकला करोड़ों का काला धन हमें संतुष्टि देता है। वही संतुष्टि जो हमें पर्दे पर हीरो के हाथों पिटते विलेन को देखकर मिलती है। ‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी अच्छी फिल्मों के बाद ‘घनचक्कर’ जैसी एक बेहद खराब फिल्म देने के पौने पांच साल बाद निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने इस फिल्म से जो सधी हुई वापसी की है, उससे वह उम्मीदें जगाते हैं। फिल्म के संवादों के लिए रितेश शाह तारीफ के हकदार हैं। ‘इंडिया के ऑफिसर्स का नहीं, उनकी बीवियों का बहादुर होना जरूरी है’जैसा संवाद और मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ का जिक्र बताता है कि उनकी कलम में अभी काफी स्याही बची है। फिल्म के किरदारों के अनुरूप कलाकारों के चयन के लिए अभिषेक बैनर्जी और अनमोल आहूजा की भी तारीफ जरूरी है। अजय देवगन एक बार फिर से फुल फॉर्म में हैं। संवादों, आंखों और चेहरे के हाव भाव से वह मारक अभिनय करते हैं।सांसद बने सौरभ शुक्ला लाउड होने की तमाम संभावनाओं के …

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  • 3 March

    Pari Movie Review

    Pari: Not a Fairytale Movie Review  |3/5|   रिव्यू-‘परी’-कथा नहीं व्यथा है -दीपक दुआ…  किसी हाॅरर फिल्म से आखिर हमें क्या उम्मीद होती है? यही न कि उसमें कोई बुरी आत्मा होगी जो किसी के शरीर में घुस जाएगी। फिर वो उसे और उसके आस पास वालों को चैन से जीने नहीं देगी।कोई तांत्रिक, ओझा, पंडित, पादरी टाइप का बंदा आएगा। तंतर-मंतर होंगे, खून-खराबा होगा, फिर सब सही हो जाएगा।चलते-चलते एक सीन ऐसा भी आएगा कि फिल्म का सीक्वेल बन सके। पहले राम से भाइयों और इधर विक्रम भट्ट ने हमें हाॅरर फिल्मों के नाम पर जो अफीम चटाई है उसके नशे में हम किसी हाॅरर फिल्म से इससे कुछ हट कर दिखाने की उम्मीद भी नहीं करते हैं। यही कारण है कि अपने यहां हाॅरर के नाम पर सुपर नेचुरल चीजें ही ज्यादा आती हैं,साइक्लाॅजिकल नहीं। कोई रामगोपाल वर्मा इस रास्ते पर चलना भी चाहता है तो किनारे कर दिया जाता है। खैर, अनुष्का शर्मा की यह फिल्म ‘परी’ हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है जिसमें सुपर नेचुरल बातें होने के बावजूद इंसानी पहलुओं को नजर अंदाज नहीं किया गया है। बतौर निर्माता अनुष्का शर्मा अभी तक की अपनी तीनों फिल्मों-‘एन.एच.10’, ‘फिल्लौरी’ और अब ‘परी’ से अपनी एक अलहदा जमीन तलाश रही हैं। स्वाभाविक है कि इस तलाश में उन्हें ठोकरें भी मिलेंगी लेकिन उनकी इस हिम्मत की तारीफ बनती है कि मसाला सिनेमा के पाले से आने के बावजूद वह एक अनदेखे, अनजाने मैदान में पांव टिकाने की कोशिशें कर रही हैं। प्रोसित राॅय के निर्देशन में संभावनाएं दिखती हैं। अनुष्का शर्मा अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं तो प्रमब्रत चटर्जी अंडरप्ले करते हुए असर छोड़ते हैं। रजत कपूर, ऋताभरी चक्रवर्ती, दिब्येंदु भट्टाचार्य व तमाम दूसरे कलाकार उम्दा काम करते दिखे हैं। कैमरे के दृष्टि और बैकग्राउंड म्यूजिक से अपेक्षित असर सामने आ पाया है। कोलकाता शहर की बारिश भी इसमें एक किरदार के तौर पर दिखती है और जेहन में बाकी रह जाती है। इस फिल्म की कहानी आम दर्शकों के लिए थोड़ी क्न्फ्यूजन भरी हो सकती है। डराने वाले दृश्यों से ज्यादा दहलाने वाले दृश्यों का होना भी हाॅरर पसंद करने वालों को अखर सकता है।कहानी का ट्रीटमैंट लीक से हट कर है और मुमकिन है नींबू-मिर्ची की आदत लगा बैठे दर्शकों को यह न पसंद आए। लेकिन अगर सचमुच हाॅरर के दायरे में कुछ हट कर देखने का मन हो,कुछ मैच्योर किस्म का समझ में आता हो तो यह फिल्म आपको पसंद आएगी और याद भी …

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February, 2018

  • 23 February

    Sonu Ke Titu Ki Sweety Movie Review { 3.5/5 }

    Sonu Ke Titu Ki Sweety Movie Review { 3.5/5 }  रिव्यू-‘चुटीले’ सोनू के ‘प्यारे’ टीटू की ‘करारी’ स्वीटी -दीपक दुआ… बचपन के दो दोस्त सोनू और टीटू। पक्के याड़ी। टीटू रोए तो सोनू चुप कराए। टीटू को लड़की गलत मिली तो सोनू ने ब्रेकअप करवा दिया। जब टीटू की शादी …

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  • 18 February

    Kuch Bheege Alfaaz Movie Review

     Kuch Bheege Alfaaz  Movie Review (3/5)   रिव्यू-मन को नम करते ‘कुछ भीगे अल्फाज़’ -दीपक दुआ… कभी ऐसा भी होता है न कि रेडियो सुनते-सुनते किसी आर.जे. के साथ इश्क हो जाए? इश्क न सही, उस आर.जे. के साथ, उसके अल्फाज़ों के साथ, एक राब्ता-सा तो जुड़ने ही लगता है।निर्देशक …

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  • 17 February

    Aiyaary Movie Review (1/5)

    Aiyaary Movie Review रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’ –दीपक दुआ…  ‘अय्यारी’ का मतलब क्या होता है? पिछले दिनों जिस किसी के भी सामने इस फिल्म का जिक्र हुआ तो यह सवाल सबसे पहले पूछा गया। यानी आप बिना आगे कुछ पढ़े यह समझ लीजिए कि कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने नाम से ही पिटने लगती हैं। ‘अय्यारी’ उन्हीं में से एक है। खैर, ‘अय्यारी’ या ‘अय्यार’ शब्द का मेरी जानकारी में इकलौता इस्तेमाल बाबू देवकी नंदन खत्री के ‘चंद्रकांता’ सीरिज के उपन्यासों में मिलता है। राजा-महाराजों द्वारा नौकरी पर रखे जाने वाला ऐसा गुप्तचर जो जरूरत पड़ने पर पल भर में रूप बदलने, घोड़े से भी तेज दौड़ने,किसी को तुरंत काबू करने, बेहोश को होश में लाने जैसे ढेरों ऐसे फन जानता हो जो उसे काबिल गुप्तचर बनाते हों। अब बात इस फिल्म की। कहानी कुछ यूं है कि… छोड़िए, बड़ी ही उलझी हुई कहानी है। मेरा तो दिमाग घूम गया। इतनी करवटें, इतनी सिलवटें, इतनी परतें, इतने मोड़ कि आप अपने बाल नोंच डालें कि भैय्ये, कहना क्या चाहते हो? जो कहना चाहते हो, सीधे-सीधे कह दो, नहीं तो घुमा-फिरा कर कह दो, यह जलेबियां क्यों बना रहे हो भाई? चलिए ट्रीटमैंट की बात कर लेते हैं। अपने फ्लेवर से ‘एक था टाईगर’, ‘फैंटम’, ‘बेबी’, ‘हाॅलीडे’, ‘स्पेशल 26’, ‘बेबी’, ‘नाम शबाना’, ‘रुस्तम’ जैसी लगती इस फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। बल्कि ऐसा लगता है कि नीरज ने ऐसे मिजाज की फिल्मों में से थोड़ा-थोड़ा चुरा कर अपनी ‘अय्यारी’ से उन्हें रूप बदल कर परोस दिया है। भारतीय सेना के अंदर के भ्रष्टाचार, सफेद कॉलर में देश को बेचने निकले सौदागरों और रक्षा-सौदों से पैसे बना रहे लोगों के साथ-साथ मुंबई के आदर्श सोसायटी घोटाले जैसे भारी-भरकम मुद्दों को एक साथ समेटती इस फिल्म में बहुत कुछ कहने-दिखाने की गुंजाइश थी लेकिन यह हर मोर्चे पर औंधे मुंह गिरी है। इसे देखते हुए न आप चौंकते हैं, न दहलते हैं, न आपकी मुठ्ठियां भिंचती हैं, न आपके अंदर देश प्रेम हिलोरे मारता है, न आपभावुक होते हैं, न आपको गुस्सा आता है, न आपको यह उदास करती है। सच तो यह है कि …

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  • 8 February

    धूमधाम से बंटे पेज 3 फैशन अवाड्र्स

    धूमधाम से बंटे पेज 3 फैशन अवाड्र्स -दीपक दुआ फैशन शो में कोई अवार्ड मिले और सीधे बॉलीवुड में एंट्री हो जाए तो क्या कहने। पिछले दिनों यही हुआ दिल्ली में आयोजित ‘पेज 3 फैशन और ज्वैलरी अवाड्र्स’ में। 5 फैशन डिजाइनरों और 2 ज्वैलर्स ने इसमें हिस्सा लिया जिनके …

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  • 6 February

    सूरजकुंड मेले में संस्कृतियों का संगम

    सूरजकुंड मेले में संस्कृतियों का संगम -दीपक दुआ दिल्ली से सटे फरीदाबाद के सूरजकुंड इलाके में 1987 में शुरू किया गया सूरजकुंड मेला आज पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान पा चुका है। अब ‘सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय क्राफ्ट्स मेला’ के नाम से मशहूर यह मेला अब विश्व का सबसे बड़ा …

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January, 2018

  • 30 January

    सोच बदलती हैं ‘पैडमैन’ जैसी फिल्में

    सोच बदलती हैं ‘पैडमैन’ जैसी फिल्में दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से मुंबई पहुंचे अभिनेता राकेश चतुर्वेदी नसीरुद्दीन शाह के थिएटर ग्रुप ‘मोटली’ के प्रमुख अभिनेताओं में गिने जाते हैं। राकेश ‘परजानिया’ में काम कर चुके हैं और बतौर निर्देशक दो फिल्में ‘बोलो राम’ और ‘भल्ला एट हल्ला डॉट …

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