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Paltan Movie Review

Based on the Nathu La military clashes of 1967 which took place along the Sikkim border, Paltan showcases an untold story of the Indian forces facing off in an intense battle to ward off a Chinese infiltration. Paltan, a war drama, focuses on the hard-hitting truth of India's relations with China, and how it is important to acknowledge that China, an enormous power in world politics, poses to be a huge threat to India.

Paltan Movie Review

 

रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’

-दीपक दुआ… 

कुछ सैनिक।उनके परिवारों की कहानियां। सरहदपर एक सच्चीलड़ाई। जोश,जज़्बा, देशप्रेम…बन गई ‘बॉर्डर’।एक उम्दा,क्लासिक वाॅर-फिल्म।

फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एकसच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात… बन गई ‘एल.ओ.सी. कारगिल’। क्लासिकन सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म।

एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां।एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव… बन गई ‘पलटन’। लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न।

एक ही फ़ॉर्मूले पर और एक ही शैलीमें कई सारी फिल्में बनाना कोई गलत नहीं।लगभग हर फिल्मकार ने ऐसाकिया है, करता है। लेकिन अगर आपके फ़ॉर्मूले का गाढ़ापन कम और आपकी शैली की धारभोथरी होती चली जाए तो फिर ऐसी ही फिल्में बनेंगी, जो ज़रूरी होते हुए भीकमज़ोर होंगी, नाकाबिल-ए-तारीफ होंगी।

अपने यहां की युद्ध आधारित फिल्मों में हमारा दुश्मन आमतौर पर पाकिस्ता नही रहा है जबकि सच यह भी है भारत-चीन के संबंध भी कभी बहुत मीठे नहीं रहे, आज भी नहीं है। चेतन आनंद की ‘हकीकत’ ज़रूर 1962 के भारत-चीन युद्ध की बात करती है लेकिन उस लड़ाई में चीन के हाथों बुरी तरह से हारने के पांचसाल बाद नाथू ला और चो ला की लड़ाई की कहानी तो शायद इतिहास के छात्रों को भी न याद हो। जे.पी. दत्ता की यह फिल्म उसी नाथू ला की लड़ाई के बारे मेंहै जिसमें अगर भारतीय सेना न जीती होती तो मुमकिन है कि आज सिक्किमका नाम चीनी नक्शे में होता।

लेकिन वह लड़ाई आमलड़ाइयों जैसी नहीं थी। एक-दूसरे से चंद मीटर की दूरी पर बैठे हिन्दुस्तानी और चीनी सिपाही वहां गोलियों से नहीं बल्कि गालियों, धक्कों,पत्थरों से लड़ रहे थे। कहसकते हैं कि वह लड़ाई शारीरिक से ज़्यादा मानसिक तौर पर लड़ी जा रही थी। दत्ता ने उसे पूरी ईमानदारी से दिखाया भी है। लेकिन इस किस्म की फिल्म में जो नाटकीयता, जो आक्रामकता, जो व्यापकता और जो विशालता होनी चाहिए (जिसकी लत भी हमें दत्ता ने ही लगाई), उसकी कमीइस फिल्म को सर्वदा शक्तिशाली होने से रोक देती है। सैनिकों की बैक-स्टोरी काउसी पुराने घिसे-पिटे स्टाइल में होना, दमदार संवादों की कमी और सबसे बढ़कर दमदार अभिनेताओं की कमी भी इस फिल्म को सिर्फ एक औसत फिल्म ही बना पाती है। क्लाइमैक्स में शहीद सैनिकों के अस्थि-कलशों का घर आनाआंखें नम करता है।

हालांकि सभीकलाकारों की मेहनत दिखती है लेकिन ऊपर वालेने उन बेचारों की रेंज ही

सीमित बनाई हैतो वो भी क्या करते। फिल्म में कई जगह चीनी संवादों के नीचे अंग्रेज़ी में सब-टाइटल हैं। क्यों जी, हिन्दी कीचंद लाइनें भी तो हो सकती थीं। या फिर चीनी ही रहने देते। आखिर ‘इन्दी-चीनी बाई-बाई’ ही तो हैं। गीत-संगीत अच्छा होते हुए भी दिल में नहीं उतरपाता। दिल में तो खैर, यह पूरी फिल्म ही नहीं उतर पाती। पर हां, इस तरह की कहानियां कही जानी चाहिएं। वरना वक्त की धूल हमारे इतिहास को धुंधला करती जाएगी और पता भी नहीं चलेगा।

 

 

अपनी रेटिंगदो स्टार

 

 

 

 

 

 

 

 

दीपक दुआ- फिल्म समीक्षक

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

यह आलेख सब से पहले www.cineyatra.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

Watch Paltan – Official Trailer | Jackie Shroff, Arjun Rampal, Sonu Sood | J P Dutta Film

 

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