Tag: deepak dua

Rajasthan International Film Festival

उम्दा फिल्मों को नवाजा गया राजस्थान फिल्म समारोह में -दीपक दुआ   हाल ही में जयपुर में आयोजित किए गए पांचवें राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म समारोह (रिफ) के आखिरी दिन कई उम्दा फिल्मों, फिल्मकारों और कलाकारों को पुरस्कृत किया गया। इस बार के ‘रिफ’ की सबसे बड़ी खासियत थी पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के सौजन्य […]

तितिक्षा स्कूल का अलंकरण समारोह

तितिक्षा स्कूल का अलंकरण समारोह दिल्ली के रोहिणी स्थित तितिक्षा पब्लिक स्कूल का अलंकरण समारोह बेहद भव्य तरीके से मनाया गया। इस अवसर पर पद्मभूषण से सम्मानित पहलवान महाबली सतपाल और ओलंपिक विजेता पद्मश्री सुशील कुमार बतौर चीफ-गैस्ट उपस्थित थे। विभिन्न क्षेत्रों की अन्य कई हस्तियों के साथ फिल्म समीक्षक दीपक दुआ का भी इस […]

सुनहरे दौर के किस्से सुनाएंगे दीपक दुआ

सुनहरे दौर के किस्से सुनाएंगे दीपक दुआ किस्सागोई की परंपरा अब डिजिटल रूप ले चुकी है। महफिलों से उठ कर रेडियो तक पहुंची किस्सागोई अब मोबाइल ऐप्स के जरिए हर किसी की पहुंच में है। यही कारण है कि स्वीडन मूल की कंपनी ‘स्टोरीटेल’ का ऐप काफी पसंद किया जा रहा है जिसमें फिलहाल हिन्दी, […]

पुरुष भी टूट कर प्यार कर सकता है

पुरुष भी टूट कर प्यार कर सकता है -दीपक दुआ   दिल्ली में जन्मे मगर दुबई और न्यूजीलैंड में पले-बढ़े मोहित मदान को एक्टिंग का शौक मुंबई खींच लाया। बचपन से ही अपने भीतर हिन्दी फिल्मों का नशा महसूस कर चुके मोहित यहां काफी सारे विज्ञापनों के अलावा राज शैट्टी की फिल्म ‘लव एक्सचेंज’ और […]

Padmaavat Movie Review { 2.5 /5 } Sanjay Leela Bhansali

 Padmaavat Movie Review { 2.5/5 } Sanjay Leela Bhansali Padmaavat (formerly titled Padmavati), is a 2018 Indian epic period drama film directed by Sanjay Leela Bhansali. Deepika Padukone stars as Rani Padmavati, alongside Shahid Kapoor as Maharaja Rawal Ratan Singh, and Ranveer Singh as Sultan Alauddin Khilji. Aditi Rao Hydari, Jim Sarbh, Raza Murad, and Anupriya Goenka feature in supporting roles. Based on the epic poem Padmavat (1540) by Malik Muhammad Jayasi, the film narrates the story of […]

दंगल की समीक्षा अब स्कूली किताब में

‘दंगल’ की समीक्षा अब स्कूली किताब में आमिर खान वाली फिल्म ‘दंगल’ के बारे में देश भर में समीक्षकों-आलोचकों ने अलग-अलग तरह से लिखा। लेकिन इन्हीं में से एक समीक्षा ऐसी भी निकली जो अब स्कूली किताबों में एक पाठ की तरह पढ़ाई जा रही है। दिल्ली स्थित फिल्म समीक्षक दीपक दुआ की लिखी इस […]

Tiger Zinda Hai Movie Review {4/5} Salman Khan

Tiger Zinda Hai Movie Review Tiger Zinda Hai is an Indian action thriller film directed by Ali Abbas Zafar. The film stars Salman Khan, Katrina Kaif, and Sajjad Delfrooz in main roles, and Paresh Rawal, Angad Bedi, Kumud Mishra, and Nawab Shah in supporting roles. It is the second in the franchise after 2012 Ek […]

Jaipur Wax Museum and Sheesh Mahal – Amazing, Incredible

Jaipur Wax Museum and Sheesh Mahal – Amazing, Incredible Jaipur Wax Museum at Nahargarh Fort जयपुर वैक्स म्यूजियम और शीश महल-अद्भुत, अतुल्य  -दीपक दुआ   मोम से बने पुतलों को देखने के लिए मैडम तुसाद म्यूजियम का नाम भले ही दुनिया भर में मशहूर हो लेकिन अपने देश में भी ऐसा एक म्यूजियम है जिसे देखने के […]

Kadvi Hawa (Dark Wind) Movie Review

Kadvi Hawa (Dark Wind) Movie Review   रिव्यू-कड़वी है मगर जरूरी है -दीपक दुआ…  ‘कड़वी हवा’ का एक सीन देखिए। क्लास के सब बच्चे एक लड़के की शिकायत करते हुए कहते हैं कि मास्टर जी, यह कह रहा है कि साल में सिर्फ दो ही मौसम होते हैं-गर्मी और सर्दी। मास्टर जी पूछते हैं-बरसात का मौसम कहां गया? जवाब मिलता है- ‘मास्साब, बरसात तो साल में बस दो-चार दिन ही पड़त…!’ यह सुन कर सब बच्चे हंस पड़ते हैं। इधर थिएटर में भी हल्की-सी हंसी की आवाजें फैलती हैं। लेकिन इस हल्के-फुल्के सीन में कितना बड़ा और कड़वा सच छुपा है उसे आप और हम मानते भले नहों, अच्छे से जानते जरूर हैं। बचपन में स्वेटर पहन कर रामलीला देखने वाली हमारी पीढ़ी आज दीवाली के दिन कोल्ड-ड्रिंक  पीते हुए जब कहती है कि अब पहले जैसा मौसम नहीं रहा, तो यह उस सच्चाई का ही बखान होता है जिसे जानते तो हम सब हैं, लेकिन उसके असर को मानने को राजी नहीं होते। नीला माधव पांडा की यह फिल्म हमें उसी सच से रूबरू करवाती है-कुछ कड़वाहट के साथ। कहानी बीहड़ के एक ऐसे अंदरूनी गांव की है जहां मौसम की मार के चलते हर किसान पर कर्ज है जिसे वापस करने की कोई सूरत न देख किसान एक-एक कर खुदकुशी कर रहे हैं।बैंक के कर्ज की वसूली करने वाले गुनु बाबू को लोग यमदूत कहते हैं क्योंकि वह जिस गांव में जाता है वहां दो-चार लोग तो मौत को गले लगा ही लेते हैं। गुनु बाबू के लिए उसके ‘क्लाइंट’ चूहे हैं। ऐसे में एक अंधा बूढ़ा अपने बेटे के लिए गुनु बाबू से एक अनोखा सौदा कर लेता है। पर क्या कड़वी हवा किसी को यूं ही छोड़ देती है? इस किस्म की फिल्मों के साथ अक्सर यह दिक्कत आती है कि ये या तो अति नाटकीय हो जाती हैं या फिर उपदेश पिलाने लगती हैं। और कुछ नहीं तो हार्ड-हिटिंग बनाने के चक्कर में इनमें दिल दहलाने वाली घटनाएं डालना तो आम बात है। लेकिन इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। सौ मिनट की होने के बावजूद यह मंथर गति से चलती है, मानो इसे अपनी बात कहने की कोई जल्दी नहीं है। इतने पर भी यह जो कहना और महसूस करवाना चाहती है, बहुत ही सहजता से करवा देती है। नितिन दीक्षित ने अगर अपनी लेखनी से फिल्म को खड़ा किया है तो ‘आई एम कलाम’ और ‘जलपरी’ जैसी उम्दा फिल्में दे चुके नीला माधव पांडा अपने निर्देशकीय-कौशल का भरपूर प्रदर्शन करते हुए इसे ऊंचाई पर ले गए हैं। हालांकि मौसम की मार से ज्यादा यह कर्जे की मार तले दबे किसानों की कहानी लगती है और […]

Review of this week’s film ‘Tumhari Sulu’ by Deepak Dua

Review of this week’s film ‘Tumhari Sulu’ by Deepak Dua रिव्यू-दिल जीतती ‘तुम्हारी सुलु’ –दीपक दुआ…  सुलोचना बारहवीं फेल है। बैंक में काम करने वाली ‘कामयाब’ बहनों की इस छोटी बहन के पति की सीमित आमदनी है।लेकिन वह अपने घर-परिवार में खा-पीकर मस्त रहती है। साथ वाले फ्लैट में रहती एयर होस्टेस लड़कियों को देख कर उसकी आंखों में भी चमकीले सपने तैरते हैं। उसे जीतना आता है। ‘मैं कर सकती है’ और ‘मुझे हर काम में मजा आता है’ जैसा उसका एटिट्यूड उसे चैन से नहीं बैठने देता। इसलिए कभी वह कॉलोनी की गायन-प्रतियोगिता में तो कभी नींबू-चम्मच रेस में तो कभी रेडियो पर पूछे जाने वाले सवाल का जवाब दे कर इनाम और इज्जत हासिल करती रहती है। ऐसे में सुलोचना को मिल जाता है रेडियो पर एक लेट-नाइट शो में काम करने का ऑफर, और वह बन जाती है लोगों की रातों को जगाने, उनके सपनों को सजाने वाली आर.जे. सुलु। पर क्या उसका परिवार उसके इस रूप को स्वीकार कर पाता है? इस कहानी में कुछ भी फिल्मी-सा नहीं है।सुलोचना जैसी औरतें हमारे घर-परिवार-पड़ोस में अक्सर दिख जाती हैं जो जिंदगी में करना तो बहुत कुछ चाहती हैं लेकिन हालात उन्हें चूल्हे-चौके तक सीमित करके रख देते हैं। पर कभी मौका मिले तो ये औरतें कुछ न कुछ हटके वाला काम कर ही जाती हैं। पड़ोस के किसी घर की-सीलगती इस कहानी में सब कुछ सामान्य है। अभावों में हंस-खेल कर जीता परिवार, घर, परिवार, नौकरी, बच्चे की पढ़ाई की चिकचिक, बाहर वालों से मिलती तारीफों के बीच अपनों के तानें… ऐसी स्क्रिप्ट लिखने के लिए लेखक को अपने लेखक वाले खोल से बाहर निकल कर आम इंसान होना होता है और सुरेश त्रिवेणी व विजय मौर्य ने यह बखूबी कर दिखाया है। फिर इस फिल्म में बोली गई जुबान चौंकाती है। मुंबइया परिवारों में लोग किस तरह से बात करते हैं, उसे करीब से परख कर इसमें परोसा गया है। लेकिन फिल्म कमियों से भी परे नहीं है। शुरूआत में उठान भरती कहानी बाद के पलों में दोहराव और बिखराव का शिकार होने लगती है। कुछ चीजें अखरने लगती हैं और कहानी के बहाव में आ रही दिक्कत भी साफ महसूस होती है। दो घंटे बीस मिनट की इसकी लंबाई अच्छा-खासा एडिट मांगती है।    सुरेश त्रिवेणी बतौर निर्देशक अपनी इस पहली फिल्म से असर छोड़ते हैं। गीत-संगीत फिल्म के माहौल में फिट है। एक्टिंग के मामले में जहां विद्या बालन हर बार की तरह प्रभावित करती हैं वहीं नेहा धूपिया भी चौंकाती हैं। बल्कि अंत के एक सीन में तो वह विद्या पर भारी पड़ती हैं। मानव कौल ने जिस तरह से खुद को अंडरप्ले करते हुए विद्या के पति के किरदार को निभाया है, वह तारीफ के हकदार हैं। विजय मौर्य ने खुद को इतना हल्का रोल क्यों दिया? वह कमाल के एक्टर हैं और हम उन्हें और ज्यादा देखना चाहते हैं। विद्या […]