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Rajasthan International Film Festival-RIFF-2019

Rajasthan International Film Festival-RIFF-2019   गांधी को समर्पित होगा राजस्थान फिल्म समारोह -दीपक दुआ अपने पांचवें बरस में पहुंच चुका राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म समारोह (रिफ) इस बार महात्मा गांधी को समर्पित होगा। 19 से 23 जनवरी तक जयपुर के जी.टी. सैंट्रल मॉल स्थित आइनॉक्स में होने जा रहे इस समारोह के दौरान पुणे स्थित राष्ट्रीय […]

रिव्यू-न्यूटन-‘न्यू’ है और ‘टनाटन’ भी…

रिव्यू-न्यूटन-‘न्यू’ है और ‘टनाटन’ भी… –दीपक दुआ…   मां-बाप ने नाम रखा था नूतनकुमार। लोग सुन कर हंसते थे तो उसने दसवीं के फॉर्म में ‘नू’का ‘न्यू’ कर दिया और ‘तन’ का ‘टन’। अब न्यूटन कुमार(राजकुमार राव) सरकारी नौकर हैं और नियम-कायदे के पक्के। लोकसभा चुनाव में बंदे की ड्यूटी लगती है छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाके के एक छोटे-से गांव में जहां सिर्फ 76 वोटर हैं। वहां मौजूद सुरक्षा बल की टुकड़ी का मुखिया आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) चाहता है कि बस, किसी तरह से वोट डल जाएं और आज का यह दिनबीते। लेकिन न्यूटन बाबू हर काम पूरे नियम और कायदे से करेंगे, चाहे खुद की जान पर हीक्यों न बन आए।   दुनिया का सबसे लोकतंत्र भारत और उस लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव आम चुनाव।गौर करें तो इन चुनावों के मायने नेताओं के लिए, चुनाव करवाने वाले कर्मचारियों के लिए, सुरक्षा बलों के लिए और जनता के लिए अलग-अलग होते हैं। 76 वोटर वाले इस गांव की किसी नेता को फिक्र नहीं है। लेकिन न्यूटन ट्रेनिंग में मिली सीख-स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने पर तुला है। न्यूटन की यह जिद उसकी टीम के लोकनाथ बाबू (रघुवीर यादव) की सोच और आत्मा सिंह के रवैये पर भारी पड़ती है।बूथ लेवल अधिकारी के तौर पर इस टीम से जुड़ी स्थानीय टीचर मल को नेताम (अंजलि पाटिल) की टिप्पणियां चुभते हुए अलग ही सवाल पूछती हैं। असल में वह मल को ही है जो इन शहरी बाबुओं को बताती है कि यहां के आदिवासियों के लिए चुनाव कितने गैर जरूरी हैं।वोट दें तो नक्सली मारेंगे और न दें तो पुलिस। हमें क्या चाहिए, यह कोई नहीं पूछता, जैसे छोटे मगर चुभते संवाद फिल्म को गहराई देते हैं और न्यूटन, लोकनाथ व आत्मा के बीच के संवाद लगातार एक चुटीलापन बनाए रखते हैं। चाहें तो इस फिल्म को कुछ हद तक एकब्लैक कॉमेडी के तौर भी देख सकते हैं। कुछ एक सिनेमाई छूटों और चूकों को नज़र अंदाज़ करते हुए देखें तो यह फिल्म लीक से हट कर बनने वाले सिनेमा की एक उम्दा मिसाल है।     निर्देशक अमित वी. मासुरकर के अंदर ज़रूर कोई सुलेमानी कीड़ा है जो उन्हें बार-बार लीक से हट कर फिल्में बनाने को प्रेरित करता है। अपनी पिछली फिल्म ‘सुलेमानी कीड़ा’ के बाद वह एक बार फिर अपनी प्रतिभा का बेहतरीन प्रदर्शनकरते हैं। एक्टिंग सभी की कमाल की है। राजकुमार,रघुवीर यादव, पंकज, संजय मिश्रा, सभी की। अंजलि तो आदिवासी ही लगने लगी हैं अब। उन मुकेश प्रजापति का काम भी बढ़िया है जो चुनावी टीम का हिस्सा हैं लेकिन उन्हें संवाद बमुश्किल ही मिले।  यह […]