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Simmba Movie Review by Deepak Dua

रिव्यू-‘सिंबा’-माईंड ईच ब्लोईंग पिक्चर -दीपक दुआ…  अगर खबरों में छोटी-सी बच्ची से लेकर बूढ़ी औरतों तक से हो रहे रेप की खबरों को पढ़-सुन कर आप के मन में आता है ऐसा काम करने वालों को तो बीच बाजार में ठोक देना चाहिए या इनका ‘वो’ ही काट देना चाहिए। अगर फलते-फूलते अपराधियों और पुलिस के गठजोड़ की खबरें आपको बेचैन करती हैं और आपका मन करता है कि कोई आए और इस सारे सिस्टम को अपनी पॉवर से बदल कर रख दे तो लीजिए, रोहित शैट्टी आपके लिए ‘सिंबा’ लेकर आए हैं।सिंबा मंझे पोलीस इनिसपैक्टर संग्राम भालेराव। बोले तो-ऐसा फटाका जो बड़ा धमाका करेगा, मगर इंटरवल के बाद।     बचपन में पॉकेट मारते हुए अनाथ सिंबा ने जब देखा कि असली पॉवर तो पुलिस के पास है तो उसने पुलिस वाला बनने की ठान ली। पढ़-लिख कर इंस्पैक्टर बन भी गया लेकिन सिर्फ पैसे कमाने के लिए। मगर फिल्म का हीरो है तो भ्रष्ट होने के साथ-साथ दिल का सच्चा और भावुक मिजाज तो होगा ही।एक हादसे के बाद उसका ईमान जागा और उसने सारे बुरे लोगों की वाट लगा डाली-जाहिर है, अपने ईच इस्टाइल में।   इस कहानी में नया कुछ नहीं है। हिन्दी सिनेमा बरसों पहले ऐसी ढेरों कहानियां परोस चुका है जिनमें पुलिस वाला हीरो बुरे लोगों को खत्म करने के लिए कानून हाथ में लेता है। बेईमान से ईमानदार होते हीरो की कहानियां भी हमने बहुत देख लीं। बावजूद इन सबके यह फिल्म अच्छी लगती है, लुभाती है, बांधती है और सच कहूं तो जकड़ती भी है क्योंकि एक तो इसमें वो मनोरंजन है जो आपको सब कुछ भुला कर आनंदित होने का मौका देता है। दूसरे इसमें वे बातें भी हैं जिन्हें आप अपने समाज में होते हुए देखना चाहते हैं, लेकिन देख नहीं पाते हैं। आप चाहते हैं कि पुलिस वाले ईमानदार हों, अपराधियों से उनके गठजोड़ न हों और वे गलत काम करने वालों का न केस, न तारीख, ताबड़ तोड़ फैसला सुनाएं। लेकिन चूंकि असल में ऐसा नहीं होता है तो यह फिल्म आपको वो सब दिखा कर उद्वेलित भी करती है। स्क्रिप्ट में ‘किंतु-परंतु’ की ढेर सारी गुंजाइश, ‘फिल्मीपने’ और भरपूर ‘ड्रामा’ के बावजूद रोहित शैट्टी ये सब आपको इतनी रफ्तार से, इतने निखार से, इतनी रंगत से, इतने चुटीले संवादों, इतने धमाकेदार एक्शन, इतने मन भाते चेहरों और इतने थिरकाते गीत-संगीत के साथ परोसते हैं कि आपकी नजरें पर्दे से नहीं हटती हैं। बड़ी बात यह भी है कि यह फिल्म साफ-सुथरा सलीकेदार मनोरंजन देती है जो इन दिनों मसाला फिल्मों से लापता होता जा रहा है। और …

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रिव्यू-‘गोलमाल’ है भई सब झोलझाल है…

रिव्यू-‘गोलमाल’ है भई सब झोलझाल है… -दीपक दुआ…  सबसे पहले कहानी की बात। हंसिए मत, ‘गोलमाल’ जैसी फिल्मों में भी कहानी होती है। भले ही वह कितनी ही महीन, बारीक, पतली,हल्की, कमजोर, बेकार या ऊल-जलूल क्यों न हो। तो, इस कहानी में ‘गोलमाल’ वाले सारे कैरेक्टर ऊटी के एक अनाथाश्रम में पले-बढ़े हैं। उस अनाथाश्रम के सेठ जी …

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