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Thugs of Hindostan Movie Review | रिव्यू-ठग्स ऑफ बॉलीवुड है यह – by Deepak Dua

Thugs of Hindostan Movie Review by Deepak Dua रिव्यू-ठग्स ऑफ बॉलीवुड है यह -दीपक दुआ… आखिर एक लंबे इंतज़ार और काफी सारे शोर-शराबे के बाद ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान’ की बंद मुट्ठी खुल ही गई। और अब आप यह जानना चाहेंगे कि यह फिल्म कैसी है? क्या इस फिल्म पर अपनी मेहनत और ईमानदारी (या बेईमानी) से कमाए गए पैसे खर्च किए जाएं या फिर इसे छोड़ दिया जाए? चलिए, शुरू करते हैं।   साल 1795 के हिन्दोस्तान की रौनक पुर (चंपक, नंदन,पराग की कहानियों से निकले) नाम वाली कोई रियासत। ऊंचा, भव्य किला जो किसी पहाड़ी पर है लेकिन समुंदर के ठीक सामने। (अब भले ही अपने देश में ऐसी कोई जगह न हो।) लेकिन वहां कोई भी ऐसा पेड़ नहीं दिखता जो अक्सर समुंदरी किनारों पर पाए जाते हैं।अरे भई, काल्पनिक इलाका है, आप तो मीन-मेख निकालने बैठ गए। खैर,अंग्रेज़ी अफसर क्लाइव ने यहां के राजा को मार दिया लेकिन राजा का वफादार खुदा बख्श (अमिताभ बच्चन) राज कुमारी ज़फीरा (फातिमा सना शेख) को लेकर निकल भागा।  11 बरस में इन्होंने ‘आज़ाद’ नाम से बागियों की एक फौज बनाली जो अंग्रेज़ों की नाक में दम किए हुए है। उधर अवध का रहने वाला फिरंगी मल्लाह (आमिर खान) अंग्रेज़ों के लिए काम करता है और उन ठगों को पकड़वाता है जो लोगों को लूटते हैं। (अवध का आदमी समुद्री इलाके में…? आपन सवाल बहुते पूछते हो गुरु)। क्लाइव साहब खुदा बख्श यानी आज़ाद को पकड़ने का जिम्मा फिरंगी को सौंपते हैं। लेकिन फिरंगी की तो फितरत ही है धोखा देना। वह कभी इस को, कभी उस को तो कभी सब को धोखा देता हुआ इस कहानी को अंजाम तक पहुंचाता है। कहा जा रहा था कि यह फिल्म ‘कन्फेशन्स आॅफ ए ठग’ नाम के एक उपन्यास …

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रिव्यू-‘लखनऊ सैंट्रल’ से दूरी ही भली

रिव्यू-‘लखनऊ सैंट्रल’ से दूरी ही भली -दीपक दुआ…   कुछ अनगढ़ लोगों ने एक टोली बनाई।दुनिया के सामने नाचे-गाए मगर उनका असल मकसद कुछ और था। याद कीजिए, यही थी न फराह खान की शाहरुख खान वाली फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ की कहानी ? कुछ साल पहले लखनऊ जेल में कुछ कैदियों का एक म्यूजिकल बैंड बना था जिसकी ख्याति इतनी फैली कि जेल वालों ने उन्हें कभी-कभार बाहर जाकर परफॉर्म करने की इजाजत भी दे डाली। अब सिर्फ इस बैंड की कहानी पर फिल्म बनती तो शायद सूखी रहजाती। सो, इसमें जेल से भागने का तड़का लगा कर बनी है ‘लखनऊ सैंट्रल’। नायक के बिना किसी कसूर के जेल में पहुंचने, एक एन.जी.ओ. वाली मैडम जी की मदद से वहां बैंड बनाने,भागने के लिए साथी चुनने और फिर वहां से भागने की योजना को अंजाम देने की इस कहानी में क्या कुछ नहीं हो सकता था? कायदे से डाले जाते तो आंसू निकालने वाले इमोशंस, मुट्ठियां बंधवाने वाले सीन, हिला देने वाले संवाद और भी न जाने क्या-क्या…!  लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है। इस तरह की फिल्में बनाने के लिए हमारे फिल्म वालों को 1981 में आई अंग्रेजी फिल्म ‘एस्केप टू विक्टरी’ जरूर देखनी चाहिए। जवान लड़का जेल में 18 महीने बाद भी कसरती बदन लिए चुपचाप सब बर्दाश्त करता रहता है। बैंड बनाता है तो लल्लुओं को लेकर। चंद दिनों में उन्हें ट्रेंड भी कर देता है। मगरपरफॉरर्मेंस से ठीक पहले उन्हें पेरोल पर छुड़वा देता है। भागना चाहता है ताकि बाहर जाकरबैंड बना सके। अरे भैये, लोग पहचानेंगे नहीं क्या तेरे को…? ढेरों ऊल-जलूल और बेतुकी बातों के बीच राहत देने का काम सिर्फ और सिर्फ कलाकारों की एक्टिंग ने की है। फरहान खुद तो कमजोर लगे लेकिन दीपक डोबरियाल, राजेश शर्मा,गिप्पी ग्रेवाल, इनामुल हक, रोनित राय, वीरेंद्र सक्सेना, रवि किशन आदि को देखना आनंद देता है। डायना पेंटी भी बेहद साधारण रहीं। रंजीत तिवारी कायदे की स्क्रिप्ट ही खड़ी नहीं कर पाए तो निर्देशन कहां से बढ़िया देते। गाने भी बस दो ही जंचे। एक हद के बाद यह फिल्म देखना जेल में कैद होने जैसा लगने लगता है। जबरन ठूंसी गईकहानी देखने से तो बेहतर है कि इससे दूर ही रहा जाए।          अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार                 …

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