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Movie Review Race 3

Movie Review Race 3 रिव्यू-‘रेस 3’-छी… छी… छी…! -दीपक दुआ…  ‘रेस’ के नाम से याद आती हैं अब्बास-मस्तान के कसे हुए डायरेक्शन में बनीं वो दो जबर्दस्त थ्रिलर फिल्में जो एक-दूजे का सीक्वेल थीं। लेकिन इस वाली फिल्म की कहानी और किरदारों का उनसे कोई नाता नहीं है। अच्छा ही है। वरना उन फिल्मों का भी नाम खराब होता। नाम तो ‘रेस’ ब्रांड का अब भी डूबा ही है और ऐसा डूबा है कि शायद ही कभी उबर सके। खैर…! किसी विलायती मुल्क में आलीशान जिंदगी जीते हुए गलत धंधे कर रहे एक परिवार के सदस्यों के रिश्ते जैसे दिखते हैं, वैसे हैं नहीं। ये सब एक-दूजे को पछाड़ने में लगे हुए हैं। वजह वही पुरानी है-बिजनेस, पैसे और पॉवर पर कब्जा।ऊपर से प्यार और अंदर से तकरार टाइप की ये कहानियां कई बार देखी-दिखाई जा चुकी हैं। इनमें जो किरदार जितना भोला और विश्वासपात्र दिखता है, वह असल में उतना ही कमीना और कमज़र्फ निकलता है। आप भले यह सोच कर हैरान होते रहें कि स्सालों, इतनी ऐश से रह रहे हो, फिर यह मारामारी क्यों? खैर…! इस किस्म की फिल्म को वैसी वाली थ्रिलर होना चाहिए जिसमें भरपूर एक्शन हो,रिश्तों का इमोशन हो और रोमांस का लोशन हो। यहां भी ये सब कुछ है। लेकिन इन सबके मिश्रण से जो चू…रण बन कर आया है वो आप को लूज़ मोशन लगवा सकता है।वजह-फिल्म में कहानी के नाम पर जो है उसे आप सीधी-सरल भाषा में चूं-चूं का मुरब्बा (और वो भी फफूंदी लगा हुआ) कह सकते हैं। हथियारों का धंधा कर रहे शमशेर का दोस्त बिरजू (जिसका नाम फोन-स्क्रीन पर बरिजू आता है), अगर हिन्दुस्तान के नेताओं के कारनामों की हार्ड-डिस्क की खबर नहीं लाता तो क्या शमशेर के पास रेस जीतने का कोई और प्लान था…? स्क्रिप्ट सिरे से पैदल है।थ्रिलर फिल्म और इतने सारे छेद…? आपने कहीं जरा-सा भी दिमाग एप्लाई किया तो मुमकिन है कि आपका दिमाग इस बात पर नाराज होकर हड़ताल करदे कि टिकट खरीदते समय मुझ से पूछा था क्या…? एक्शन है, लेकिन वह आपको दहलाता नहीं है। एक …

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Carry on Gippy Grewal

Carry on Gippy Grewal कैरी ऑन गिप्पी ग्रेवाल -दीपक दुआ पंजाबी एंटरटेनमैंट इंडस्ट्री के चमकते सितारे गिप्पी ग्रेवाल अब अपनी अगली फिल्म ‘कैरी ऑन जट्टा 2’ लेकर आए हैं जो 2012 में आई उन्हीं की फिल्म ‘कैरी आॅन जट्टा’ सीरिज़ का हिस्सा है। हाल ही में दिल्ली आए गिप्पी से …

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Movie Review Parmanu The Story of Pokhran

Movie Review Parmanu The Story of Pokhran  रिव्यू-सच के पोखरण में फिल्मी ‘परमाणु’ -दीपक दुआ… 1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण कितने जरूरी थे? उनसे हमारे देश की सामरिक ताकत कितनी बढ़ी? और क्या उसी वजह से 1999 में हमें कारगिल झेलना पड़ा? इस किस्म के सवाल राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों …

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