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Gold Movie Review 2018

Gold Movie Review   रिव्यू-फीकी चमक वाला ‘गोल्ड’  -दीपक दुआ…  1936 के बर्लिन ओलंपिक में गुलाम भारत यानी ब्रिटिश इंडिया की हॉकी टीम ने गोल्ड मैडल तो जीता लेकिन स्टेडियम में ब्रिटेन का राष्ट्र गान बज रहा था। देश आज़ाद हुआ तो उसी टीम के जूनियर मैनेजर ने सपना देखा कि 1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम ‘दो सौ साल की गुलामी’ के बाद जीते और अपने ‘जन गण मन…’की धुन पर गोल्ड लेकर आए। और बस, वो जुट गया तमाम बाधाओं के बीच एक जानदार टीम तैयार करने में जो एक शानदार जीत हासिल कर सके। यह सही है कि 1948 में भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ब्रिटेन को उसी के घर में 4-0 से हरा कर गोल्ड जीता था। लेकिन इतिहास यह नहीं बताता कि वो सपना किसी टीम-मैनेजर का था। लेकिन यह फिल्म है जनाब, जो इतिहास के कुछ सच्चे किस्सों में ढेर सारी कल्पनाएं मिला कर आपको देश प्रेम की ऐसी चाशनी चटाती है कि आप बिना कुछ आगा-पीछा सोचे बस, उसे चाटते चले जाते हैं। फिल्म अपने कलेवर से ‘चक दे इंडिया’ और ‘लगान’ सरीखी लगती है। लेकिन अपने तेवर से यह उनके पांव की धूल भी साबित नहीं हो पाती। ‘चक दे इंडिया’ का कोच कबीर खानखुद पर लगे दाग को साफ करने के लिए लौटा है। ‘लगान’के खिलाड़ी अपनी दासता के दर्द पर जीत का मरहम लगाना चाहते हैं। लेकिन यहां टीम-मैनेजर तपन दास क्यों बावलों की तरह खुद को, अपने पैसों को,अपनी पारिवारिक ज़िंदगी को हॉकी की टीम खड़ा करने में डुबो रहा है, फिल्म यह बताना ज़रूरी नहीं समझती। एक तरफ उसके किरदार को पियक्कड़, धोखेबाज़,खिलंदड़ दिखाया जाना और दूसरी तरफ देश के प्रति अचानक से जगने वाला समर्पण अजीब-सा लगता है। बेहतर होता कि तपन की किसी बैक-स्टोरी से कोई पुख्ता आधार बनाया जाता और उस पर कहानी की इमारत खड़ी होती। फिल्म की स्क्रिप्ट भी कई गैर ज़रूरी और लंबे दृश्यों के कारण बार-बार हिचकोले खाती है। कुछ एक मिनट की कटाई-छंटाई इसे और बेहतर बना सकती थी। हालांकि कहानी लगातार आगे की तरफ चल रही है, तपन के टीम को बनाने की मेहनत,आज़ादी और मुल्क के बंटवारे के बाद टीम के कई सदस्यों का हिन्दुस्तान से चले जाना, तपन का एक नई टीम बनाना, लंदन में पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी खिलाड़ियों का एक-दूजे को सपोर्ट करना जैसे सीक्वेंस लुभाते तो हैं लेकिन ज़्यादा मजबूती से बांध नहीं पाते। क्लाइमैक्स में होने वाले मैच में भारत के जीतने और उधर स्टेडियम व इधर थिएटर में लोगों के खड़े होने ने रोमांचित करना ही था, सो किया।   यह फिल्म इतना तो बताती ही …

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Satyameva Jayate Movie Review

Satyameva Jayate  Movie Review   रिव्यू-‘सत्यमेव जयते’-असली मसाले सच-सच -दीपक दुआ…  एक सीन देखिए। एक करप्ट पुलिस अफसर एक मां से कहता है तू यहां नमाज़ पढ़,अंदर मैं तेरे बेटे को मारता हूं।देखता हूं तेरा अल्लाह उसे कैसे बचाएगा। नमाज़ खत्म होने तक अपना हीरो आकर उस पुलिस वाले को मार देता है। दूसरा सीन देखिए। एक और करप्ट पुलिस अफसर मोहर्रम के दिन एक मुस्लिम लड़की की इज़्ज़त पर हमला करता है। अपना हीरो आकर उस पुलिस वाले को मोहर्रम के मातम के बीच मार देता है। आप कहेंगे कि यह फिल्म तो सिर्फ मुस्लिम दर्शकों को खुश करने के लिए बनाई गई है। ऐसा नहीं है जनाब, जब भी अपना हीरो किसी करप्ट पुलिस अफसर को मारता है तो पीछे से शिव तांडव स्तोत्र बजने लगता है। लीजिए, हो गए न हिन्दू दर्शक भी खुश…? हीरो चुन-चुन कर करप्ट पुलिस अफसरों को मारता है। मारता ही नहीं,जलाता भी है।क्यों? इसके पीछे उसकी अपनी एक स्टोरी है। दूसरा हीरो यानी ईमानदार डी.सी.पी.उसे पकड़ने की फिराक में है और उसकी भी अपनी एक स्टोरी है। हीरो के पास हीरोइन है जिसकीएक और स्टोरी है। इसके बाद होता यह है कि… छोड़िए न, क्या फर्क पड़ता है किक्या होता है, कैसे होता है। जिस फ्लेवर की यह फिल्म है उसमें स्टोरी की क्वालिटी से ज़्यादा मसालों का तीखा पन देखा जाता है और वो इस फिल्म में प्रचुर मात्रा में छिड़का गया है। कहानी ठीक-ठाक सी है जिस पर लिखी स्क्रिप्ट पैदल होने के बावजूद आम दर्शकों को लुभाने का दम रखती है। भ्रष्ट पुलिस वालों को ‘न केस न तारीख, सीधे मौत की सज़ा’ टाइप की फिल्में अपने यहां अक्सर आती हैं और उन्हें आम दर्शकों की तालियां-सीटियां भी मिलती हैं। पर्दे पर ही सही, हीरो के हाथों भ्रष्ट लोगों को मारे जाते देखने का अपना एक अलग ही सुख होता है और यह सुख इस फिल्म को देखते हुए भी बार-बार मिलता है। इस किस्म की फिल्मों में डायलॉग भी ऐसे ही रखे जाते हैं जो सिंगल-स्क्रीन थिएटरों और छोटे सैंटर्स में तालियां पा सकें। एक्शन ज़बर्दस्त भले न हो, दहलाता तो है ही। जॉन अब्राहम अपनी रेंज में रहकर ठीक-ठाक काम कर लेते हैं। मनोज वाजपेयी भी अपना दम दिखा देते हैं। अमृता खान विलकर जैसी अदाकारा के टेलेंट को फिल्म ज़ाया करती …

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Dhadak Movie Review

Dhadak Movie Review By Deepak Dua   रिव्यू-‘धड़क’ न तो ‘सैराट’ है न ‘झिंगाट’ -दीपक दुआ…  ऊंची जात की अमीर लड़की। नीची जातका गरीब लड़का। आकर्षित हुए, पहले दोस्ती, फिर प्यार कर बैठे। घर वाले आड़े आए तो दोनों भाग गए। जिंदगी की कड़वाहट को करीब से देखा, सहा और धीरे-धीरे सब पटरी पर आ गया।लेकिन…! इस कहानी में नया क्या है, सिवाय अंत में आने वाले एक जबर्दस्त ट्विस्ट के? कुछ भी तो नहीं। फिर इसी कहानी पर बनी मराठी की ‘सैराट’ कैसे इतनी बड़ी हिट हो गई कि तमाम भाषाओं में उसके रीमेक बनने लगे। कुछ बात तो जरूर रही होगी उसमें। तो चलिए, उसका हिन्दी रीमेक भी बना देते हैं। कहानी को महाराष्ट्र के गांव से उठा कर राजस्थान के उदयपुर शहर में फिट कर देते हैं। हर बात, हर संवाद में ओ-ओ लगा देते हैं। थारो, म्हारो, आयो, जायो, थे, कथे, कोणी, तन्नै,मन्नै जैसे शब्द डाल देते हैं (अरे यार, उदयपुर जाकर देखो, लोग प्रॉपर हिन्दी भी बोल लेते हैं। और हां, यह ‘पनौती’ शब्द मुंबईया है, राजस्थानी नहीं)। हां, गानों के बोल हिन्दी वाले रखेंगे और संगीत मूल मराठी फिल्म वाला(ज्यादा मेहनत क्यों करें)। ईशान खट्टर और जाह्नवी कपूर जैसे मन भावन चेहरे, शानदार लोकेशंस, रंग-बिरंगे सैट, उदयपुर की खूबसूरती… ये सब मिल कर इतना असर तो छोड़ ही देंगे कि पब्लिक इसे देखने के लिए लपकी चली आए। तो जनाब, इसे कहते हैं पैकेजिंग वाली फिल्में। जब आप दो और दो चार जमातीन सात गुणा दस बराबर सत्तर करते हैं तो आप असल में मुनाफे की कैलकुलेशन कर रहे होते हैं न कि उम्दा सिनेमा बनाने की कवायद। दो अलग-अलग हैसियतों या जातियों के लड़के-लड़की का प्यार और बीच में उनके घर वालों का आ जाना हमारी फिल्मों के लिए कोई नया या अनोखा विषय नहीं है। मराठी वाली ‘सैराट’ के इसी विषय पर होने के बावजूद मराठी सिनेमा की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनने के पीछे के कारणों पर अलग से और विस्तार से चर्चा करनी होगी। लेकिन ठीक वही कारण आकर उसके हिन्दी रीमेक को भी दिलों में जगह दिलवा देंगे, यह सोच ही गलत है। बतौर निर्माता करण जौहर का जोर अगर पैकेजिंग पर रहा तो उसे भी गलत नहीं कहा जा …

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